सूरत : नासीरनगर तोड़फोड़ मामले में गुजरात हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी, राज्य सरकार और पुलिस से पूछे तीखे सवाल
कोर्ट ने पूछा— एक महीने बाद भी एफआईआर क्यों नहीं? राज्य सरकार सक्रिय क्यों नहीं हुई? 9 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
सूरत। नासीरनगर तोड़फोड़ प्रकरण में गुजरात हाई कोर्ट ने गुरुवार को सुनवाई के दौरान राज्य सरकार, सूरत महानगरपालिका (एसएमसी) और पुलिस प्रशासन के रवैये पर गंभीर सवाल उठाए।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए पूछा कि घटना के एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद पुलिस शिकायत दर्ज क्यों नहीं की गई और इस मामले में राज्य सरकार अब तक सक्रिय क्यों नहीं हुई।
इस मामले में 26 प्रभावित लोगों की ओर से गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका में राज्य सरकार, सूरत महानगरपालिका, सूरत पुलिस आयुक्त, एसओजी डीसीपी राजदीप सिंह नकुम, निजी बिल्डर, संबंधित पुलिस व एसएमसी कर्मचारी तथा टोरेंट पावर को पक्षकार बनाया गया है।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने एसएमसी द्वारा डिप्टी म्युनिसिपल कमिश्नर की अध्यक्षता में गठित जांच समिति पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि इतनी गंभीर घटना की जांच केवल स्थानीय अधिकारियों तक सीमित क्यों रखी गई। राज्य सरकार स्वयं इस मामले में सक्रिय क्यों नहीं हुई?
कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की घटना में उच्च स्तर पर निगरानी और जांच आवश्यक है तथा यह केवल स्थानीय अधिकारियों का विषय नहीं माना जा सकता।
अदालत ने पुलिस की भूमिका पर भी कड़ी टिप्पणी करते हुए पूछा कि यदि पुलिस की मौजूदगी में कथित अवैध तोड़फोड़ हुई, तो अब तक कोई आपराधिक शिकायत दर्ज क्यों नहीं की गई। अदालत ने कहा कि यदि जांच ही चलती रहेगी तो गंभीरता कहां दिखाई देगी? कोर्ट ने यह भी पूछा कि लोगों के घरों को तोड़ना क्या आपराधिक अपराध नहीं माना जाएगा?
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने टोरेंट पावर से पूछा कि संबंधित क्षेत्र की बिजली आपूर्ति तोड़फोड़ शुरू होने से पहले बंद की गई थी या बाद में। टोरेंट पावर की ओर से बताया गया कि एसएमसी के सेंट्रल ज़ोन से शैलेशभाई नामक व्यक्ति का फोन आने के बाद टीम मौके पर पहुंची थी। कंपनी के अनुसार, वहां पहुंचने पर तोड़फोड़ की कार्रवाई जारी थी और बिजली आपूर्ति चालू थी, जिसे बाद में मुख्य जंक्शन बॉक्स से बंद किया गया।
कोर्ट ने पूछा कि क्या केवल फोन पर सूचना मिलने के आधार पर बिजली काटी जा सकती है और क्या इसके लिए कोई निर्धारित प्रोटोकॉल है? टोरेंट पावर ने बताया कि ऐसा कोई लिखित प्रोटोकॉल नहीं है, लेकिन सुरक्षा कारणों से बिजली आपूर्ति बंद करनी पड़ती है।
राज्य सरकार की ओर से पेश एडवोकेट जनरल ने अदालत को बताया कि एसएमसी की प्रारंभिक जांच में डेमोलिशन के दौरान मौजूद अधिकारियों से पूछताछ की गई थी। जांच में अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने पर दो कार्यपालक अभियंताओं सहित पांच इंजीनियरों को निलंबित कर विभागीय जांच शुरू कर दी गई है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि जिस क्षेत्र में तोड़फोड़ हुई वह एसएमसी के सेंट्रल ज़ोन में आता है या नॉर्थ ज़ोन में। एडवोकेट जनरल ने इसे सेंट्रल ज़ोन बताया, जबकि याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने संपत्ति कर बिल का हवाला देते हुए दावा किया कि संबंधित संपत्ति नॉर्थ ज़ोन में दर्ज है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि एसएमसी की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट केवल औपचारिकता है और पूरे मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। उनका कहना था कि यदि केवल सीमांकन (डिमार्केशन) करना था, तो मौके पर जेसीबी जैसी भारी मशीनरी क्यों लाई गई थी। इससे स्पष्ट होता है कि पूरी कार्रवाई पूर्व नियोजित थी।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि लगभग 100 परिवार प्रभावित हुए हैं और केवल कर्मचारियों को निलंबित कर देना पर्याप्त कार्रवाई नहीं माना जा सकता।
सरकार की ओर से मुख्य लोक अभियोजक ने अदालत को बताया कि पुलिस की भूमिका केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित थी और मुख्य कार्रवाई एसएमसी द्वारा की गई थी।
इस पर अदालत ने पूछा कि यदि पुलिस की मौजूदगी में कथित अवैध तोड़फोड़ हुई, तो पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई क्यों नहीं की। अदालत ने कहा कि डीसीपी स्तर के अधिकारी मौके पर मौजूद थे, ऐसे में यह कहना कठिन है कि उन्हें पूरी कार्रवाई की जानकारी नहीं थी।
मुख्य लोक अभियोजक ने अदालत को बताया कि नासीरनगर क्षेत्र में असामाजिक तत्वों की गतिविधियों और पूर्व में अवैध रूप से रह रहे 44 बांग्लादेशी नागरिकों की गिरफ्तारी के कारण वहां अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया था। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि इससे तोड़फोड़ की कार्रवाई को उचित नहीं ठहराया जा रहा है।
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि डेमोलिशन के दौरान डीसीपी राजदीप सिंह नकुम ने प्रभावित लोगों से कहा था कि यदि हाई कोर्ट जाना है तो चले जाएं। इस पर हाई कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसा कथन रिकॉर्ड में प्रमाणित होता है, तो संबंधित वीडियो की फोरेंसिक जांच कराकर डीसीपी के विरुद्ध भी आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रथम दृष्टया इस कार्रवाई को अवैध बताते हुए प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की योजना प्रस्तुत करने को कहा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर आवश्यक संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करने से वह पीछे नहीं हटेगी।
मामले की अगली सुनवाई 9 जुलाई को निर्धारित की गई है।
