सूरत : पहले मृत्यु के अवसरों पर खाई जाने वाली घारी अब मानो त्यौहारी सीज़न का मुख्य व्यंजन बन गई है!

प्रतिकात्मक तस्वीर

तात्या टोपे द्वारा सामूहिक तौर पर घारी खाना शुरू करने के बाद सूरत में शुरू हुई थी सामूहिक घारी खाने की परंपरा

सूरत में चंदी पड़वा पर सूरत की प्रजा हर साल करोड़ों कि घारी खा जाते है। हालांकि आज-कल के नौजवानों को इस घारी के इतिहास के बारे में शायद ही कोई जानकारी होगी। ऐसे में आज हम आपको इस घारी के इतिहास के बारे में बताने जा रहे है। सालों पहले जब किसी के यहाँ किसी की मृत्यु होती थी, तब लोग मगज या घारी बनाते थे, इस प्रेत भोजन कहते थे। हालांकि इस प्रेत भोजन में बनने वाले घरी का स्वाद लोगों को इस कदर पसंद आ गया कि उन्होंने इसमें कुछ बदलाव कर इसे मुख्य मिठाई बना दी गई।
प्रेत भोजन के तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली इस मिठाई को आजा सूरत की प्रजा द्वारा विभिन्न फ्लेवर में अब इस मिठाई को पेश किया जा रहा है और लोग भी इस मिठाई में खरीदने के लिए घंटो तक लाइन में खड़े रहते है। बता दे की 1857 की बगावत के बाद तात्या टोपे द्वारा सूरत में सामूहिक तौर पर घारी खाई गई थी, इसके बाद सामूहिक घारी खाने की परंपरा शुरू की गई थी।
सूरत में आई वेडरोड पर आए स्वामीनारायण सेवा मंडल कुंडल द्वारा हरिभक्तों को बिना घी की घारी बनाना शुरू किया गया था। संस्था के हरीशभाई ने कहा कि, संस्था की महिलाओं द्वारा बनाई गई घारी भक्तों के स्वास्थ्य के लिए भी काफी स्वास्थ्यवर्धक होती है। वैसे भी शहर में पिछले कई सालों से शुगर फ्री घरी की डिमांड काफी बढ़ गई है। 

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