सूरत : नासीरनगर डिमोलिशन मामले में गुजरात हाईकोर्ट सख्त, सूरत मनपा और पुलिस की भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल
बिना नोटिस गरीब परिवारों के मकान तोड़े जाने पर कोर्ट नाराज़; मनपा आयुक्त से मांगा जवाब, प्रभावित परिवारों को तत्काल वैकल्पिक आश्रय देने के निर्देश
सूरत। कतारगाम के वेड रोड स्थित नासीरनगर झुग्गी बस्ती क्षेत्र में कथित रूप से हुए डिमोलिशन को लेकर गुरुवार को गुजरात हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान तीखी बहस हुई।
मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश ने सूरत महानगरपालिका (एसएमसी) और पुलिस प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए कड़ी नाराज़गी जताई।
हाईकोर्ट ने पूछा कि बिना पूर्व लिखित नोटिस, निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और प्रभावित लोगों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए गरीब एवं मजदूर परिवारों के मकानों को किस आधार पर ध्वस्त किया गया।
अदालत ने कहा कि किसी भी सार्वजनिक हित या टाउन प्लानिंग परियोजना के तहत निर्माण हटाने से पहले संबंधित लोगों को पर्याप्त समय देकर नोटिस देना, उनकी बात सुनना तथा विशेष रूप से मानसून के मौसम में उनके पुनर्वास और वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार करना आवश्यक है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी की कि प्रथम दृष्टया इस मामले में स्थापित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया है, जिसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। कोर्ट ने नगर आयुक्त को मामले की गहन जांच करने के निर्देश देते हुए यह भी पूछा कि इतनी बड़ी कार्रवाई के बावजूद अब तक कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज क्यों नहीं की गई।
मनपा की ओर से यह दलील दी गई कि संबंधित तोड़फोड़ कार्रवाई आधिकारिक रूप से मनपा द्वारा नहीं की गई थी और यह किसी निजी भूमि मालिक अथवा बिल्डर की ओर से कराई गई हो सकती है।
इस पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए सवाल किया कि यदि कार्रवाई मनपा की नहीं थी तो मौके पर मनपा के जोनल अधिकारी और बड़ी संख्या में पुलिस बल की मौजूदगी क्यों थी। अदालत ने यह भी पूछा कि कहीं किसी अधिकारी ने अपने पद का दुरुपयोग तो नहीं किया।
हाईकोर्ट ने इन सभी बिंदुओं पर विस्तृत और लिखित जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश देते हुए सूरत महानगरपालिका को सोमवार को अदालत के समक्ष उपस्थित होने का आदेश दिया है।
साथ ही अदालत ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए प्रशासन को निर्देश दिया कि जिन परिवारों के मकान तोड़े जाने के कारण वे बेघर हो गए हैं, उन्हें वर्तमान मानसून के दौरान तत्काल वैकल्पिक आश्रय उपलब्ध कराया जाए, ताकि उन्हें किसी प्रकार की अतिरिक्त कठिनाई का सामना न करना पड़े।
