सूरत : 12 मई इंटरनेशनल नर्स डे- सिविल की नर्सें बनीं सेवा और समर्पण की मिसाल

26 वर्षों से मरीजों के दर्द और उम्मीद के बीच पुल बनीं साजिदाबेन चंद, नवजातों के लिए दूध दान कर मानवता निभा रहीं सुशीला कुमारी पटेल

सूरत : 12 मई इंटरनेशनल नर्स डे- सिविल की नर्सें बनीं सेवा और समर्पण की मिसाल

सूरत।12 मई को मनाए जाने वाले इंटरनेशनल नर्स डे के अवसर पर सूरत के न्यू सिविल हॉस्पिटल की दो नर्सों की सेवा, समर्पण और मानवता की कहानियां लोगों के लिए प्रेरणा बनकर सामने आई हैं।

इमरजेंसी ट्रॉमा सेंटर में हेड नर्स के रूप में कार्यरत साजिदाबेन चंद और स्टाफ नर्स सुशीला कुमारी पटेल न केवल मरीजों की देखभाल कर रही हैं, बल्कि अपने संवेदनशील व्यवहार और निस्वार्थ सेवा से समाज के लिए उदाहरण भी पेश कर रही हैं।

26 वर्षों से सेवा में समर्पित साजिदाबेन चंद

बारडोली की रहने वाली साजिदाबेन चंद पिछले 26 वर्षों से नर्सिंग सेवा में कार्यरत हैं और बीते चार वर्षों से न्यू सिविल हॉस्पिटल के ट्रॉमा सेंटर में हेड नर्स की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। ट्रॉमा सेंटर जैसे अत्यंत व्यस्त और संवेदनशील विभाग में वे दिन-रात मरीजों की सेवा में जुटी रहती हैं।

साजिदाबेन बताती हैं कि ट्रॉमा सेंटर में हर पल चुनौतीपूर्ण होता है। यहां सड़क दुर्घटनाओं, आगजनी, आत्महत्या के प्रयास और गंभीर रूप से घायल मरीजों को लाया जाता है। कई बार देर रात बड़े हादसों की सूचना मिलते ही उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचना पड़ता है।

उन्होंने कोविड महामारी के दिनों को याद करते हुए कहा कि रमजान के दौरान भी लगातार रोजा रखते हुए PPE किट पहनकर घंटों मरीजों की सेवा करनी पड़ती थी। “हमारा एक ही उद्देश्य था कि हर मरीज स्वस्थ होकर अपने घर लौटे,” उन्होंने कहा।

साजिदाबेन का मानना है कि मरीजों को केवल दवाइयों से ही नहीं, बल्कि संवेदनशील व्यवहार और दो प्यार भरे शब्दों से भी जल्दी राहत मिलती है। खासकर जब किसी हादसे में युवा मरीज की मौत हो जाती है, तब उसके परिवार को संभालना सबसे कठिन जिम्मेदारी होती है।

मां होने के साथ सेवा का फर्ज निभा रहीं सुशीला कुमारी

न्यू सिविल हॉस्पिटल की स्टाफ नर्स सुशीला कुमारी पटेल सेवा और मातृत्व का अनोखा उदाहरण पेश कर रही हैं। मांगरोल तालुका के लिमोदरा गांव की रहने वाली सुशीला कुमारी हाल ही में मातृत्व अवकाश पूरा कर वापस ड्यूटी पर लौटी हैं। उनका बच्चा अभी केवल नौ महीने का है।

एक ओर जहां एक मां के रूप में उन्हें हर समय अपने नवजात की चिंता रहती है, वहीं दूसरी ओर अस्पताल में आने वाले मरीजों की सेवा को भी वे पूरी जिम्मेदारी के साथ निभाती हैं।

सुशीला कुमारी कहती हैं, “जब मैं अस्पताल की दहलीज पर कदम रखती हूं, तब मरीजों की सेवा मेरी पहली प्राथमिकता बन जाती है।”

नवजात बच्चों के लिए कर रही हैं दूध दान

सुशीला कुमारी केवल मरीजों की देखभाल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे न्यू सिविल हॉस्पिटल के मिल्क बैंक में नियमित रूप से अपना ब्रेस्ट मिल्क भी डोनेट करती हैं। उनका यह योगदान उन नवजात बच्चों के लिए जीवनदायी साबित हो रहा है, जिनकी माताएं किसी कारणवश उन्हें पर्याप्त दूध नहीं पिला पातीं।

उन्होंने बताया कि मां का दूध बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और उनके संपूर्ण विकास के लिए सबसे बेहतर पोषण है। “अगर मेरे दूध से किसी जरूरतमंद बच्चे को जीवन और पोषण मिल रहा है, तो इससे बड़ी खुशी मेरे लिए कोई नहीं,” उन्होंने भावुक होकर कहा।

“सेवा परमो धर्म” को साकार कर रहीं नर्सें

इंटरनेशनल नर्स डे हर वर्ष फ्लोरेंस नाइटिंगेल के जन्मदिवस पर मनाया जाता है, जिन्हें ‘लेडी विद द लैंप’ के नाम से जाना जाता है। यह दिन नर्सों के अमूल्य योगदान और उनके समर्पण को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है।

सूरत सिविल हॉस्पिटल की साजिदाबेन चंद और सुशीला कुमारी पटेल जैसी नर्सें यह साबित कर रही हैं कि नर्सिंग केवल एक पेशा नहीं, बल्कि मानवता की सबसे बड़ी सेवा है। निजी जीवन, परिवार और व्यक्तिगत जिम्मेदारियों के बीच भी वे “सेवा परमो धर्म” के सिद्धांत को पूरी निष्ठा के साथ निभा रही हैं।

 

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