सूरत की ज़री कला: 120 वर्षों से परंपरा और आधुनिकता का संगम
सगरामपुरा का ज़रीवाला परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजो रहा GI टैग प्राप्त सूरत की ऐतिहासिक ज़री विरासत
भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक हस्तकलाओं के लिए विश्वभर में जाना जाता है। इन्हीं कलाओं में गुजरात, विशेषकर सूरत की ज़री कला की एक विशिष्ट पहचान रही है। यूनानी विद्वान मेगस्थनीज़ के ग्रंथों में उल्लेखित तथा आज GI टैग प्राप्त सूरत की ज़री और ज़री–ज़रदोज़ी कला प्राचीन काल से चली आ रही एक अमूल्य परंपरा है। इस विरासत को सूरत के सगरामपुरा क्षेत्र का ज़रीवाला परिवार पिछले 120 वर्षों से भी अधिक समय से जीवंत बनाए हुए है।
सूरत की पहचान केवल खानपान या हीरा–टेक्सटाइल उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि ज़री उद्योग जैसी पारंपरिक कलाओं से भी बनी है। सगरामपुरा में एक ही परिवार द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित इस ज़री उद्योग की नींव जैकिशनदास चपड़िया ने रखी थी। समय बदला, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन ज़री की विरासत आज भी उसी समर्पण के साथ आगे बढ़ रही है। वर्तमान में परिवार की नई पीढ़ी पारंपरिक ज़री कला को आधुनिक बाज़ार की मांग के अनुरूप ढालकर सफलतापूर्वक आगे बढ़ा रही है।
एक समय सूरत की ज़री को शहर की शान माना जाता था। मुगल काल में यहां तैयार ज़री के कपड़ों का निर्यात विदेशों तक होता था। गोपीपुरा, नवापुरा और वाडीफालिया जैसे क्षेत्र ज़री उद्योग के प्रमुख केंद्र हुआ करते थे। समय के साथ यह उद्योग कुछ हद तक मंद पड़ा, लेकिन अब इसमें फिर से नई ऊर्जा और संभावनाएं दिखाई दे रही हैं।

आज भी सूरत में तैयार की गई ज़री बनारस, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और बेंगलुरु सहित देश के विभिन्न हिस्सों में भेजी जाती है, जहां इसका उपयोग साड़ियों की बुनाई में किया जाता है। सोने और चांदी के तारों से बनी ज़री साड़ियां एक बार फिर युवा पीढ़ी की पसंद बनती जा रही हैं, जिससे इस पारंपरिक कला को नया बाज़ार मिल रहा है।
परंपरा और आधुनिकता का संतुलन बनाकर ज़री उद्योग को जीवंत बनाए रखने वाले चेतनकुमार प्रवीणभाई ज़रीवाला बताते हैं कि उनका परिवार पिछले 100 से 120 वर्षों से इस पारंपरिक व्यवसाय से जुड़ा हुआ है। पहले ज़री का कार्य पूरी तरह पारंपरिक पद्धतियों से होता था, लेकिन समय के साथ नई तकनीक और आधुनिक मशीनों को अपनाया गया। परिवार के प्रत्येक सदस्य को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं, जिससे व्यवसाय सुचारू रूप से आगे बढ़ रहा है।
वे बताते हैं कि ज़री निर्माण के साथ-साथ सोने और चांदी के तारों से बनी साड़ियों का उत्पादन और विक्रय भी परिवार स्वयं करता है। घर से ही निर्माण होने के कारण लागत कम रहती है और गुणवत्ता पर पूरा नियंत्रण बना रहता है।
चेतनभाई के अनुसार, लगभग 60 वर्ष पूर्व जहां देशी करघों से काम होता था, वहीं आज आधुनिक मशीनों का उपयोग किया जा रहा है। बी.कॉम और एल.एल.बी. की पढ़ाई पूरी करने के बाद भी उन्होंने वकालत छोड़कर पारिवारिक ज़री उद्योग को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। उनका कहना है कि आम धारणा है कि ज़री उद्योग लुप्त हो रहा है, जबकि वास्तविकता यह है कि नई तकनीकों और आधुनिक सोच के साथ यह उद्योग एक नई दिशा में आगे बढ़ रहा है।
रोज़गार और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है ज़री उद्योग
आज ज़रीवाला परिवार केवल अपना व्यवसाय ही नहीं चला रहा, बल्कि 50 से अधिक लोगों को रोज़गार भी प्रदान कर रहा है। लघु घरेलू उद्योग के रूप में विकसित यह व्यवसाय ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की भावना को साकार करता है। ज़रीवाला परिवार के लिए ज़री केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि विरासत, पहचान और साधना है।
