सूरत : अंतिम संस्कार के लिये कम पड़ रही लकड़ियां, दाताओं ने अब लकड़ियां दान करनी शुरु की

प्रतिकात्मक तस्वीर

कोरोना के कारण लगातार बढ़ रहा है मृत्युआंक, अब तक 3000 मन लकड़ियों का आया दान

शहर में कोरोना की बीमारी इस कदर फैल रही है कि अब स्मशान घाट पर मृतकों की दाह विधि के लिए लंबी-लंबी कतार लगानी पड़ रही है। कुछ दिनों पहले ही शहर में 14 साल पहले बंद कर दिया गया स्मशान घाट फिर से कार्यरत करना पड़ा। इसके बावजूद मृतक के परिवारजनों की समस्या कम नहीं हो रही है। 
मृतको को दान देने के लिए लकड़ियों की कमी की जानकारी भी सामने आ रही है। ऐसे में अब गांव के युवकों ने खेतों में और जंगलों में सूखे वृक्ष ढूंढ कर उन्हें काट कर लकड़ी इकट्ठा की है, जिससे की स्मशान घाट में लकडियां कम नहीं पड़े। सूरत जिले में ओलपाड तहसील में लोगों ने स्वयंभू लॉकडाउन लगा दिया है। जिसे की गांव के सभी लोग मान रहे हैं। ओलपाड के स्मशान घाट में सूरत तथा आसपास के क्षेत्रों को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा है। वहां भी लकड़ियों की कमी होने से होने की जानकारी सामने आ रही है। लकड़ी के लिए ऑर्डर दे दिया गया है। लेकिन इसे आने में अभी भी 15 दिन का समय बीत जाएगा।
तब तक लकड़ी की कमी को दूर करने के लिए स्मशान घाट के ट्रस्टी और युवकों ने नया प्रयोग शुरू किया है। जिसमें की सफलता भी मिल रही है। गांव के खेत या फार्म हाउस या जंगलों में कई वृक्षों की लकड़ियां सुखा गई हैं इन्हें काटना जरूरी था। इन्होंने मालिकों से मंजूरी लेकर इन सूखी टहनियों को काटना शुरू कर दिया है और इसे काट कर स्मशान घाट में दे दिया। इसके लिए किसी युवक ने अपना ट्रैक्टर दिया तो किसी ने अपना श्रमदान किया। इस तरह से लोगों ने एकता बनाकर स्मशान घाट में लकड़ी की कमी को हल कर दिया।
सूरत और सूरत शहर के आसपास के स्मशान घाट में लकड़ी की कमी के कारण बारडोली से लकड़ियों का दान दिया जा रहा है। अब तक 3000 मन से अधिक लकड़ियां स्मशान घाट पहुंचाई जा चुकी हैं। बारडोली में कई लोगों ने कोरोना की परिस्थिति को समझते हुए अब अस्पतालों में लकड़ियों का दान कर रहे हैं। कई समाजसेवी संगठन के युवक 5 दिन से रोज दो टेंपो में लकड़ियां भरकर सूरत और आसपास के स्मशान में पहुंचाने का भगीरथ कार्य कर रहे हैं। अब तक कुल 3000 मन लकडियां स्मशान घाट तक पहुंचाई जा चुकी है। कोरोना के कारण बड़ी संख्या में मृतक होने के कारण घाट में मरीजों के दाह के समय लंबा वक्त लग रहा है। इसलिए लकडियां से दाह दिया जा रहा है। इस कारण लकड़ियों की जरूरत पड़ी है

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