गुजरात के कच्छ के रहने वाले जतिन चौधरी ने माउंट एवरेस्ट फतह किया

जतिन रामसिंह चौधरी ने 12 मई को माउंट एवरेस्ट की 8848 मीटर की कठिन चढ़ाई पूरी की

किसी भी बड़ा काम पूरा करने के लिए अद्वितीय साहस की जरूरत होती है। ऐसे ही अपने जीवन की परवाह किए बिना विपरीत परिस्थितियों और चुनौतियों का सामना करते हुए मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले और कच्छ को कर्मभूमि बनाने वाले भुज के एक युवक जतिन रामसिंह चौधरी ने 12 मई को माउंट एवरेस्ट की 8848 मीटर की कठिन चढ़ाई पूरी की और अपने परिवार के साथ-साथ कच्छ का नाम रोशन किया।
जानकारी के अनुसार यूपी के मूल निवासी और और कच्छ से सेवानिवृत्त पीएसआई रामसिंह चौधरी के 42 वर्षीय बेटे जतिन ने 14 अप्रैल को माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना शुरू किया। लुकला से बेस कैंप तक पहुंचने में उन्हें 10 से 15 दिन लगे। 9 तारीख को अंतिम चढ़ाई करते हुए एवरेस्ट की चोटी पर स्वामीनारायण मंदिर का ध्वज फहराया। इस पर्वतारोहण के दौरान एसपीओ-द्वितीय यानी ऑक्सीजन स्तर 53 तक पहुंच गया।  आम तौर पर उस स्तर के किसी अन्य व्यक्ति को अस्पताल में वेंटिलेटर पर रखने की आवश्यकता होती है।  अमेजन में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम करने वाले जतिन चौधरी को फिलहाल कंपनी की ओर से वर्क फ्रॉम होम ऑफर किया जा रहा है। इसी बीच उन्होंने अपने दोस्तों के साथ पहाड़ियों में ट्रेकिंग शुरू की, जिसके बाद उन्होंने पर्वतारोहण में लग गए और इंजीनियर की नौकरी छोड़ दी और विभिन्न जगहों पर ट्रेकिंग का अभ्यास करने लगे। वो छह महीने पहले नेपाल के 6800 मीटर ऊंचे अमदाबलम पर्वत पर चढ़ी थी, जहां गिने-चुने लोग ही जाते हैं।
चढ़ाई के दौरान रास्ते में कठिनाइयों का सामना करने वाले तीन पर्वतारोहियों को हेलीकॉप्टर द्वारा बचाना पड़ा। हालांकि जतिन ने बिना हिम्मत हारे माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई की।  एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए पर्वतारोहियों के साथ नेपाल से विशेष शेरपा आते हैं, इन शेरपाओं को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाता है।  जतिन ने यह प्रशिक्षण नेपाल में पूरा किया है, इसलिए नेपाल सरकार के सचिव द्वारा उन्हें समूह का नेता बनाया गया।  समूह में 50 अन्य पर्वतारोही शामिल हुए, जिनकी सभी जिम्मेदारियां सवाया कच्छ को सौंपी गईं, जिनमें से 25 लोग एवरेस्ट पर पहुँच चुके है बाकी अभी भी रास्ते पर हैं।

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