अतदीपो भव : बुद्ध का मार्ग एक संतुलित जीवन का पक्षधर

नेपाल के मस्तांग में भगवान गौतम बुद्ध की प्रतिका का विहंगम दृश्य (Photo Credit : Wikimedia.org)

कल 26 मई को बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर विशेष

(वीरेन्द्र सिंह परिहार / ईएमएस)
भगवान बुद्ध ने अपने जमाने में जिन लोगों को देखा था उनमें एक तो वे लोग थे - जो आत्मा को नित्य और शाश्वत मानते थे और संसार को अनित्य, क्षणभंगुर, तथा दु:ख रुप मानकर कठोर तप करते थे। क्योंकि उनका मानना होता था कि इस तरह से वह कष्टरुपी संसार को पारकर एक स्थायी आनन्द के अधिकारी होंगे। दूसरे प्रकार के लोग चार्वाक नीति के अनुसार खाओ-पिओ, मौज करो - यही मानते थे। मरने के बाद क्या होगा, कौन जानता है ? वस्तुत: ये दोनों जीवन दर्शन ही अतिवादी थे। बुद्ध ने इन दोनों अतियों अथवा अन्तों से बचने की सलाह देते हुए मध्यम मार्ग को प्रतिष्ठित किया था।
वस्तुत: बुद्ध का मार्ग एक संतुलित जीवन का पक्षधर है। बुद्ध का मानना है कि जो लोग शरीर को नाना प्रकार का कष्ट देकर ही आध्यात्मिक सुख मानते है, वे वस्तुत: शरीर को ही महत्व देते है। और जो लोग शरीर के सुख में ही लीन रहते है वे तो जड़ शरीर को ही सब कुछ मानते है। बुद्ध कहते थे कि वीणा के तारों को इतना मत कसो की वों टूट जावे और न इतना ढीला छोड़ दो कि उनसे कोई सुर ही न निकले। कहने का आशय यह कि शरीर को अत्याधिक प्रताड़ना यह शरीर को अत्याधिक सुख भोग दोनो ही अभीष्ठ नही है। इसीलिए तो बुद्ध मध्यम वर्ग या संतुलित मार्ग की बात करते है।
गीता में भी भगवान कृष्ण ने कहा है जिसका आहार-विहार नियमित है, कर्मों का आचरण नपा तुला है, नीद और जागरण परिमित है, उसी के लिए योग दु:ख-नाशक हो सकता है। वस्तुत: यह भी मध्यम या संतुलित दृष्टि ही है, जिसका विकास आगे चलकर बुद्ध के दर्शन में देखने को मिला। बुद्ध ने कभी यह नही कहा कि मै जो कहता हूं उसे मान लो। वह कहते थे - संसार के स्वरुप की जानकारी प्राप्त करो। रोग को जानो, रोग के कारण को जानो, रोग के कारण के उच्छेद का उपाय करो। अपनी मशाल खुद बनो - अतदीपो भव। 
बुद्ध की सोच निहायत ही क्रान्तिकारी एवं लोकतांत्रिक थी। वह कहते थे - भिख्खुओ मैं तुम्हारा आह्वान करता हूं, यदि मुझे में, मेरे वचन और कर्म में कोई त्रुटि देखते हो तो मुझसे कहो। उनकी यह बाते राजा राम की उन बातों की याद दिलाती है - ” जो अनीति कुछ भाषौ काई, तो मोंहि बरजहु भय बिसराई। वे कहते थे - तथागत ऐसा नही मानते कि वे ही भिक्षुओं का पथ-प्रदर्शन कर सकते है अथवा संघ उनके ऊपर ही निर्भर है। फिर संघ के विषय में किसी प्रकार के निर्देश छोड़ने की क्या आवश्यकता है। बुद्ध की शरण में जाने के बजाय वह धर्म की अथवा सत्य की शरण में जाने को प्राथमिकता देते थे, तभी उन्होने आनन्द से कहा था - सत्य को दीपक की भांति दृढ़ता से पकड़े रहो। सत्य की शरण लिए रहो। अपने से बाहर किसी से शरण की आशा न करो। इसीलिए जब उनकी पूजा के लिए स्मारक बनाने की बात उठी। तब उन्होने कहा था - तथागत की शरीर-पूजा में तुम अपने कार्य में बाधा न उत्पन्न करो। जो भिक्षु या भिक्षुणी उपासक या उपासिका बड़े-छोटे धर्मों का ठीक निर्वाह करता हुआ (धम्मानुधम्म परिपत्रो) समोचीन जीवन में लगा है। जो शिक्षाओं का पालन करता है। वही तथागत का सत्कार करता, गौरव करता, मान करता और परम -पूजा से पूजित करता है।
एक बार उनके एक प्रमुख शिष्य सारिपुत्र मौगदाल्यन ने कहा - आपसे बढ़कर ज्ञानी और महान न पहले कोई हुआ न आगे कभी होगा, और न इस समय है। बुद्ध ने कहा - अवश्य सारिपुत्र - तुम भूतकाल के सभी बुद्धों को जान गये हो ? नही भगवन, सारिपुत्र ने कहा। तुम उन्हे जानते हो जो भविष्य में होंगे ? नही भगवन! तो कम से कम तुम मुझे जानते हो और मेरे मन की भलीभांति थाह ले चुके हो ? वह भी नही भगवन। तो सारिपुत्र तुम्हारे शब्द इतने भब्य और साहसपूर्ण क्यों ? कुल मिलाकर इस तरह से बुद्ध का दृष्टिकोण जहां ब्यक्ति-पूजा के एकदम विरुद्ध था, वही वह अपने शिष्यों से यह अपेक्षा करते थे कि उनकी अपनी सोच हो, दृष्टि हो, वह लकीर के फकीर न हो, बल्कि वह सत्य का मार्ग स्वत: शोधन करे। वह कहते थे - मै चमत्कारो के प्रदर्शन को भयावह समझता हूं, इसलिए मै उन्हे बिलकुल पसन्द नही करता, उन्हे घृणा की दृष्टि से देखता हू और उनकी बात से मुझे लज्जा आती है। यह बताने की जरुरत नही कि चमत्कारों और हांथ की कलाबाजी के चलते हमारा भारतीय समाज कितना दिग्भ्रमित होकर पतन की ओर गया है। 
(Photo Credit : Wikimedia.org)
बहुत विचार के बाद बुद्ध ने यह बताया कि तृष्णा और कामना सब दुखो का मूल है, उसी के कारण प्राण बार-बार जन्म और मृत्यु के चक्कर में पड़ता है। इससे आत्यंतिक निवृत्ति तभी हो सकती है, जब तृष्णा का क्षय हो जाए। वह मानते थे कि ब्रह्म या आत्मा की नित्यता या अनित्यता की चर्चा करते रहने से यह उद्देश्य सिद्ध नही होता। इसके लिए आवश्यक है - सम्यक जीवन, विवेक सहित रहना, शील का पालन, मैत्री का आचरण - इस तरह से बुद्ध ने कर्मकाण्डो की जगह पवित्र जीवन पर ही अधिक जोर दिया है। 
भगवान बुद्ध ने कहा कि वही सुखी है जो जय-पराजय की भावना का त्याग करता है। वजह यह कि जय की भावना से बैर उत्पन्न होता है, पराजय से दु:ख उत्पन्न होता है। उनका मानना था - अक्रोध के द्वारा क्रोध को, साधुता के द्वारा असाधु भाव को, दान के द्वारा कदर्प और सत्य के द्वारा मृषावाद या झूंठ को जीतना चाहिए। उनके अनुसार जिसका किसी से बैर नही है और जो सभी प्राणियों से मैत्री करता है वही सुखी होता है। 
बहुत से लोग यह साबित करने का प्रयास करते है, कि बुद्ध का मार्ग सनातन धर्म के विरुद्ध था, जबकि ऐसा नही है। वस्तुत: बुद्ध ने उस दौर में वैदिक धर्म में खासतौर से यज्ञो में आई अति हिंसा के चलते यज्ञों का विरोध किया था। उनका मार्ग भी हिन्दुत्व की धारा का ही विकास है। प्रकारान्तर से उन्होने हिन्दुत्व में आई विकृतियों को दूर करने का प्रयास किया था। उनका मध्यम मार्ग एक तरह से गीता का योग मार्ग ही है - जैसा कि पहले बताया जा चुका है। बुद्ध ने कहा था - श्वसन क्रिया के प्रति सचेत रहे, यही गीता भी कहती है। बुद्ध ने स्वत: कहा था आज मैने उस अविनाशी पद को प्राप्त कर लिया है जो मुझसे पूर्व ऋषियों ने प्राप्त किया है। इसलिए यह कहने में कोई झिझक नही कि वह हिन्दुत्व की ऋषि परंपरा के ही वाहक थे। वस्तुत: बुद्ध ने हिन्दुत्व में आई कमियों को दूर करने के लिए एक ऊंच-नीच और भेदभाव से परे एक समतायुक्त समाज के लिए उद्घोष किया था। यह बात अलग है कि आगे चलकर उनके पंथ में इतनी विकृतियां आई कि पंच-मकार ही अभीष्ट हो गया। जिसके चलते आदि शंकराचार्य को इस देश में बौद्ध मत का उच्छेदन करना पड़ा।
पर आज से ढाई हजार साल पहले बुद्ध ने जिस मध्यम मार्ग के माध्यम से एक संतुलित, पूर्ण एवं वैज्ञानिक मार्ग बताया। एक श्रेष्ठ जीवन और मैत्री भाव को जागृत किया, उससे आगे चलकर आधी दुनिया उनके प्रभाव में आ गई। आज वैशाखी पूर्णिमा के दिन हम उस महामानव के चरणो में शत-शत प्रणाम। 

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