सूरत : नायलॉन एफडीवाय यार्न पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी का प्रस्ताव खारिज, टेक्सटाइल इंडस्ट्री को बड़ी राहत

नायलॉन वीवर्स एसोसिएशन और सचिन इंडस्ट्रियल सोसाइटी की पहल रंग लाई; हजारों एमएसएमई यूनिट्स और 1.5 लाख से अधिक श्रमिकों को मिला लाभ

सूरत : नायलॉन एफडीवाय यार्न पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी का प्रस्ताव खारिज, टेक्सटाइल इंडस्ट्री को बड़ी राहत

सूरत। सूरत की नायलॉन और टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय ने नायलॉन एफडीवाय  (फुली ड्रॉन यार्न) पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी (एडीडी) लगाने संबंधी डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ ट्रेड रेमेडीज़ (डीजीटीआर) के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है।

इस निर्णय से सूरत सहित देशभर की हजारों एमएसएमई इकाइयों, बुनकरों, प्रोसेसरों, निर्यातकों और लगभग 1.5 लाख से अधिक श्रमिकों को बड़ी राहत मिली है।

सूरत नायलॉन वीवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मयूर चेवली, भूपेंद्र चाहवाला तथा सचिन इंडस्ट्रियल को-ऑपरेटिव सोसाइटी के सचिव मयूर गोलवाला सहित उद्योग प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ), केंद्रीय वित्त मंत्रालय, वस्त्र मंत्रालय और टेक्सटाइल कमिश्नर के समक्ष इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था।

उद्योग संगठनों ने अपनी प्रस्तुति में बताया था कि यदि आयातित नायलॉन एफडीवाय  यार्न पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी, न्यूनतम आयात मूल्य (एमआईपी), बेसिक कस्टम ड्यूटी (बीसीडी) अथवा अन्य आयात प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो इसका सीधा और गंभीर प्रभाव देशभर के एमएसएमई क्षेत्र पर पड़ेगा।

सचिन इंडस्ट्रियल को-ऑपरेटिव सोसाइटी द्वारा पीएमओ को भेजे गए पत्र में कहा गया था कि नायलॉन वीविंग और प्रोसेसिंग क्षेत्र पहले से ही बढ़ती उत्पादन लागत, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और बाजार की अनिश्चितताओं जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।

ऐसे में कच्चे माल के रूप में उपयोग होने वाले नायलॉन एफडीवाय  यार्न की कीमतों में कृत्रिम वृद्धि उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को कमजोर कर सकती है। इससे उत्पादन लागत बढ़ने, ऑर्डर घटने और रोजगार पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका जताई गई थी।

उद्योग संगठनों ने यह भी तर्क दिया था कि देश के प्रमुख नायलॉन उत्पादक वित्तीय संकट में नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने अच्छा मुनाफा कमाया है तथा उत्पादन क्षमता बढ़ाने की भी घोषणा की है। ऐसे में आयातित यार्न पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की आवश्यकता नहीं है।

सचिन इंडस्ट्रियल सोसाइटी के सचिव मयूर गोलवाला ने कहा कि कई घरेलू उत्पादक स्वयं भी विभिन्न प्रकार के यार्न का आयात करते हैं। इससे स्पष्ट है कि बाजार में मांग और आपूर्ति के संतुलन के लिए आयात आवश्यक है।

विशेष गुणवत्ता और विशिष्ट उपयोग वाले यार्न की उपलब्धता बनाए रखने में आयात की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि आयात पर प्रतिबंध लगाया जाता, तो कई डाउनस्ट्रीम उद्योगों को आवश्यक कच्चा माल प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध नहीं हो पाता।

उद्योग प्रतिनिधियों ने कुछ बड़े उत्पादक समूहों की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि जो समूह अन्य उत्पादों के आयात का समर्थन करते हैं, वही नायलॉन यार्न पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी की मांग कर रहे थे। इससे बाजार में एकाधिकार और प्रतिस्पर्धा विरोधी गतिविधियों की आशंका पैदा होती है।

उद्योग संगठनों के अनुसार, देशभर में 3,000 से अधिक डाउनस्ट्रीम इकाइयां आयातित नायलॉन यार्न पर निर्भर हैं। ऐसे में एंटी-डंपिंग ड्यूटी का लाभ केवल कुछ बड़े उत्पादकों को मिलता, जबकि हजारों एमएसएमई इकाइयों, बुनकरों, प्रोसेसरों, निर्यातकों, व्यापारियों और श्रमिकों को नुकसान उठाना पड़ता।

केंद्र सरकार के इस निर्णय का स्वागत करते हुए सूरत नायलॉन वीवर्स एसोसिएशन और सचिन इंडस्ट्रियल को-ऑपरेटिव सोसाइटी ने कहा कि इससे कच्चे माल की उपलब्धता बनी रहेगी, उत्पादन लागत नियंत्रण में रहेगी तथा एमएसएमई क्षेत्र में रोजगार और व्यावसायिक गतिविधियों को मजबूती मिलेगी।

उद्योग संगठनों ने सरकार का आभार व्यक्त करते हुए भविष्य में भी नीति निर्माण के दौरान संपूर्ण टेक्सटाइल वैल्यू चेन के हितों को ध्यान में रखने की अपील की है।