सूरत : पाटीदार आरक्षण आंदोलन के दो और मामले वापस, हार्दिक पटेल और अल्पेश कथीरिया समेत सभी आरोपी बरी
सूरत कोर्ट ने सरकार की अर्जी मंजूर की; 2018 में ट्रैफिक बाधित करने और रैली निकालने से जुड़े मामलों में राहत
सूरत। पाटीदार आरक्षण आंदोलन के दौरान दर्ज मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया के तहत सूरत की अदालत से एक और महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है।
सूरत के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) जितेंद्र सिंह की अदालत ने वर्ष 2018 में वराछा पुलिस स्टेशन में दर्ज दो मामलों को वापस लेने की राज्य सरकार की अर्जी स्वीकार कर ली है। इसके साथ ही पाटीदार आंदोलन से जुड़े सभी आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया गया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 2018 में आंदोलन के दौरान वराछा पुलिस ने जिग्नेश वघासिया, मौलित नसीत, चंद्रेश काकड़िया और रुशिक देसाई को गैरकानूनी जमावड़ा, लूटपाट, मारपीट और धमकी जैसे आरोपों में गिरफ्तार किया था। बाद में जमानत मिलने पर इन कार्यकर्ताओं को लाजपोर जेल से रिहा किया गया था।
जेल से रिहाई के बाद पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (PAAS) के नेताओं और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने उनका स्वागत किया था। इस दौरान वाहनों और बाइक रैली के साथ लाजपोर जेल से शहर के विभिन्न क्षेत्रों तक जुलूस निकाला गया था। रैली का समापन वराछा स्थित सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा पर माल्यार्पण कार्यक्रम के साथ हुआ था।
पुलिस के अनुसार, इस रैली के कारण सार्वजनिक सड़कों पर यातायात प्रभावित हुआ था और पुलिस के निर्देशों के बावजूद रैली को तत्काल नहीं हटाया गया था। इसी आधार पर तत्कालीन वराछा पुलिस निरीक्षक वी.एस. पटेल ने 10 जनवरी 2018 को मामला दर्ज कराया था।
इस मामले में हार्दिक पटेल, अल्पेश कथीरिया, धार्मिक मालवीय, जयदीप उर्फ टपू पोलरा, क्रुणाल सरधारा, पंकज सिद्धपुरा, संजय मवानी तथा कांग्रेस नेता अशोक जीरावाला समेत लगभग 150 से 200 कार्यकर्ताओं के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 143, 145, 149, 152, 341 और 188 के तहत केस दर्ज किया गया था।
डीजीपी नयन सुखदवाला के मार्गदर्शन में सहायक लोक अभियोजक (एपीपी) दिगंत तेवार ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 360 तथा दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 321 के तहत अदालत में आवेदन प्रस्तुत कर मामलों को जनहित में वापस लेने की अनुमति मांगी थी।
सरकारी पक्ष ने अदालत को बताया कि सरदार पटेल की प्रतिमा पर माल्यार्पण कार्यक्रम के लिए पुलिस प्रशासन द्वारा अनुमति प्रदान की गई थी। मामले में यातायात प्रभावित होने की शिकायत किसी आम नागरिक द्वारा नहीं, बल्कि पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज कराई गई थी। साथ ही धारा 341 समझौतायोग्य (Compoundable) प्रकृति की है और आरोपियों की ओर से किसी आपराधिक मंशा का स्पष्ट प्रमाण भी सामने नहीं आया।
अदालत ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों, कानूनी प्रावधानों और सरकारी पक्ष की दलीलों पर विचार करने के बाद यह माना कि इन मामलों की सुनवाई जारी रखना जनहित में नहीं है। इसके बाद अदालत ने दोनों मामलों को वापस लेने की अनुमति देते हुए सभी आरोपियों को बरी करने का आदेश पारित किया।
इस फैसले को पाटीदार आरक्षण आंदोलन से जुड़े पुराने मामलों के निस्तारण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
