सूरत : समर कैंप में देसी खेलों की वापसी: खो-खो, कबड्डी और गिल्ली-डंडा बने आकर्षण

डिजिटल दौर में बच्चों को मैदान से जोड़ने की पहल, शारीरिक-मानसिक विकास पर खास जोर

सूरत : समर कैंप में देसी खेलों की वापसी: खो-खो, कबड्डी और गिल्ली-डंडा बने आकर्षण

सूरत। आधुनिक और डिजिटल युग में जहां बच्चे मोबाइल, वीडियो गेम और टीवी तक सीमित होते जा रहे हैं, वहीं सूरत के कई स्कूलों ने एक सराहनीय पहल करते हुए समर कैंप में पारंपरिक देसी खेलों को फिर से जीवंत कर दिया है। शहर के विभिन्न स्कूलों में आयोजित समर कैंप में बच्चों को खो-खो, कबड्डी और गिल्ली-डंडा जैसे पारंपरिक खेलों से जोड़ा जा रहा है।

इस पहल का मुख्य उद्देश्य बच्चों को डिजिटल स्क्रीन से दूर कर उन्हें शारीरिक गतिविधियों की ओर प्रेरित करना है। लंबे समय से घरों में सीमित रह रहे बच्चों में इन खेलों ने नई ऊर्जा भर दी है। मैदान में दौड़ना, टीम बनाकर रणनीति तैयार करना और प्रतिस्पर्धा करना बच्चों को बेहद पसंद आ रहा है।

एक निजी स्कूल की कैंपस डायरेक्टर रमाबेन खत्रे ने बताया कि आज के समय में पारंपरिक खेल कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं, जबकि खो-खो और कबड्डी जैसे खेल बच्चों की फुर्ती, सहनशक्ति, एकाग्रता और टीम भावना को मजबूत बनाते हैं। वहीं गिल्ली-डंडा आंख और हाथ के समन्वय को बेहतर करता है। उन्होंने कहा कि इन खेलों के लिए महंगे उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती, जिससे हर वर्ग के बच्चे आसानी से इसमें भाग ले सकते हैं।

समर कैंप में शामिल बच्चों का कहना है कि मोबाइल गेम्स की तुलना में मैदान में दोस्तों के साथ खेलना ज्यादा रोमांचक और मजेदार है। कई बच्चों के लिए गिल्ली-डंडा एक नया अनुभव साबित हो रहा है, जिसे वे उत्साह के साथ सीख रहे हैं।

इस पहल को अभिभावकों का भी भरपूर समर्थन मिल रहा है। उनका मानना है कि छुट्टियों में बच्चे अधिकतर समय मोबाइल पर बिताते हैं, जिससे उनकी सेहत पर असर पड़ता है। ऐसे में इस तरह के कैंप बच्चों को अधिक सक्रिय, अनुशासित और स्वस्थ बनाएंगे।

सूरत के स्कूलों की यह पहल न केवल बच्चों के समग्र विकास की दिशा में एक सकारात्मक कदम है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और पारंपरिक खेलों से जोड़ने का भी एक प्रभावी माध्यम बन रही है।

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