"अलग हैं... पर कम नहीं": डाउन सिंड्रोम को समझने की एक मार्मिक पहल, सूरत में सजा विशेषज्ञों का जमावड़ा
विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस पर मेगा मेडिकल कैंप का आयोजन; विशेषज्ञों ने कहा— "सही सपोर्ट और प्यार से आत्मनिर्भर बन सकते हैं ये खास बच्चे"
सूरत। "आपका बच्चा खास है... और खास होने का मतलब कभी कम होना नहीं होता।" डॉक्टर के इन धीमे लेकिन भरोसेमंद शब्दों के साथ शुरू होती है डाउन सिंड्रोम को समझने की वह यात्रा, जो डर से नहीं बल्कि प्रेम और स्वीकार्यता से भरी है। इसी संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के लिए विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस के अवसर पर सूरत में एक भव्य चिकित्सा एवं जागरूकता अभियान का आगाज किया गया।
क्या है डाउन सिंड्रोम? विशेषज्ञों की राय
सूरत के प्रमुख बाल रोग विशेषज्ञों ने इस स्थिति से जुड़े वैज्ञानिक और सामाजिक पहलुओं पर विस्तार से जानकारी साझा की:
आनुवंशिक स्थिति (Trisomy 21): डॉ. महेश पटेल ने बताया कि यह कोई बीमारी नहीं बल्कि एक जेनेटिक कंडीशन है। सामान्यतः शरीर में 46 क्रोमोसोम होते हैं, लेकिन डाउन सिंड्रोम में एक अतिरिक्त (21वां) क्रोमोसोम जुड़ जाने से कुल संख्या 47 हो जाती है।
प्राकृतिक प्रक्रिया: डॉ. प्राची कारिया के अनुसार, यह पूरी तरह प्राकृतिक बदलाव है और इसमें माता-पिता की कोई गलती नहीं होती। हालांकि, 35 वर्ष से अधिक की आयु में गर्भधारण से जोखिम थोड़ा बढ़ सकता है।
लक्षण और पहचान: डॉ. रितेश सुखरामवाला ने साझा किया कि चेहरे का सपाट दिखना, आँखों का ऊपर की ओर झुकाव और मांसपेशियों में ढीलापन इसके सामान्य संकेत हैं।
इलाज नहीं, 'सपोर्ट' है समाधान
डॉ. अंकित परमार ने स्पष्ट किया कि आज तकनीक के माध्यम से गर्भावस्था के दौरान ही इसकी स्क्रीनिंग संभव है। इसका कोई स्थायी 'क्योर' नहीं है, बल्कि फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और सही मेडिकल मैनेजमेंट के जरिए इन बच्चों को एक खुशहाल और आत्मनिर्भर जीवन दिया जा सकता है। डॉ. प्रशांत कारिया ने जोर दिया कि शुरुआती हस्तक्षेप (Early Intervention) और विशेष शिक्षा ही इन बच्चों को सशक्त बनाने की असली चाबी है।
मेगा मेडिकल कैंप: सेवा और समर्पण का संगम
इस अवसर पर सूरत पेडियाट्रिक एसोसिएशन चैरिटेबल ट्रस्ट (SPACT), बबल्स एवं एडोलेसेंट हेल्थ एकेडमी (AHA) के संयुक्त तत्वावधान में असुतोष हॉस्पिटल में एक विशाल मेगा मेडिकल कैंप का आयोजन किया गया।
कैंप में विभिन्न सुपरस्पेशलिटी डॉक्टरों की टीम ने बच्चों का निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण किया और अभिभावकों को सरल भाषा में वैज्ञानिक मार्गदर्शन दिया। मेघना सुराना ने इस दौरान 'सपोर्ट ग्रुप्स' की महत्ता बताते हुए कहा कि अनुभव साझा करने से अभिभावकों का डर कम होता है और उन्हें भावनात्मक ताकत मिलती है।
इन विशेषज्ञों का रहा विशेष योगदान
इस पुनीत सेवा अभियान को सफल बनाने में डॉ. रितेश सुखरामवाला, डॉ. स्नेहल पटेल, डॉ. धवल शाह, डॉ. फागुन शाह, डॉ. वायरल शाह, डॉ. प्राची कारिया शाह, डॉ. आशिमा सहेतिया, डॉ. साजन अग्रवाल, डॉ. अंकित परमार, डॉ. नितिन जैन, डॉ. सोनाली पाठक, डॉ. पार्थ शाह, डॉ. उन्नति परमार, डॉ. समीर गामी, रचना दलाल और कृति देसाई ने अपना तकनीकी योगदान दिया।
वहीं, इस पूरी पहल को दिशा देने में डॉ. प्रफुल्ल बामरोलिया, डॉ. अक्षत खेमका, डॉ. महेश पटेल, डॉ. अश्विनी शाह, डॉ. प्रशांत कारिया, डॉ. राजीव राय चौधरी एवं मेघना सुराना की भूमिका सराहनीय रही।
समाज के लिए संदेश: बदलें अपनी नज़र
रिपोर्ट का निष्कर्ष एक ही सत्य पर टिकता है—डाउन सिंड्रोम वाले बच्चे भले ही सीखने में थोड़े धीमे हों, लेकिन वे पीछे नहीं हैं। उन्हें समाज से अलग करने के बजाय अवसर और धैर्य देने की आवश्यकता है। जैसा कि विशेषज्ञों ने कहा, "हमें बस अपनी नज़र बदलनी है, उनकी दुनिया अपने आप खूबसूरत हो जाएगी।"
