17 फरवरी: चिकित्सा-विधिक जागरूकता दिवस; डॉक्टरों को कानूनी सुरक्षा और न्याय के लिए IAP की बड़ी पहल

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला: बिना जांच और विशेषज्ञ राय के डॉक्टरों पर आपराधिक मामला दर्ज करना कानूनन गलत

17 फरवरी: चिकित्सा-विधिक जागरूकता दिवस; डॉक्टरों को कानूनी सुरक्षा और न्याय के लिए IAP की बड़ी पहल

सूरत। देशभर के 50,000 से अधिक शिशु रोग विशेषज्ञों के प्रतिनिधि संगठन 'इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स' (IAP) ने 'चिकित्सा-विधिक जागरूकता दिवस' (Medical-Legal Awareness Day) के अवसर पर डॉक्टरों के खिलाफ बढ़ रही अनुचित कानूनी कार्रवाइयों पर चिंता जताई है।

संगठन की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. नीलम मोहन और महासचिव डॉ. रुचिरा गुप्ता ने संयुक्त बयान जारी कर स्पष्ट किया है कि इलाज के दौरान होने वाली हर मृत्यु 'लापरवाही' नहीं होती और न ही हर डॉक्टर अपराधी है।

डॉक्टरों के खिलाफ आपराधिक मामलों में वृद्धि: एक गंभीर चिंता

वर्तमान समय में अस्पतालों और डॉक्टरों के खिलाफ आपराधिक शिकायतों और उपभोक्ता मुकदमों में भारी वृद्धि हुई है। IAP के अनुसार, किसी मरीज की स्थिति बिगड़ने या मृत्यु होने पर बिना ठोस आधार के डॉक्टरों पर 'गैर-इरादतन हत्या' (धारा 304) जैसे संगीन आरोप लगाना चिकित्सा समुदाय में असुरक्षा की भावना पैदा कर रहा है।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित सुरक्षा कवच (Landmark Judgments)

संगठन ने जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य और कुसुम शर्मा बनाम बत्रा अस्पताल जैसे ऐतिहासिक फैसलों का उल्लेख करते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट निर्देश दिए हैं:

सिर्फ 'घोर लापरवाही' ही अपराध: चिकित्सा निर्णय में मामूली त्रुटि या प्रतिकूल परिणाम को आपराधिक लापरवाही नहीं माना जा सकता।

प्रारंभिक जांच अनिवार्य: किसी डॉक्टर के खिलाफ FIR दर्ज करने से पहले पुलिस को प्रारंभिक जांच करनी होगी।

विशेषज्ञ राय जरूरी: मुकदमा शुरू करने से पहले मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) या सरकारी मेडिकल बोर्ड की स्वतंत्र राय लेना अनिवार्य है।

गिरफ्तारी पर रोक: डॉक्टरों की गिरफ्तारी सामान्य प्रक्रिया के तहत नहीं की जानी चाहिए, जब तक कि हिरासत में पूछताछ अत्यंत आवश्यक न हो।

कानूनी बाध्यता: संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत ये निर्देश सभी पुलिस थानों और अदालतों पर बाध्यकारी हैं। इनका उल्लंघन 'न्यायालय की अवमानना' माना जाएगा।

डॉ. अर्चना शर्मा का दुखद प्रकरण और सबक
IAP ने डॉ. अर्चना शर्मा के दुखद मामले का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे कानूनी प्रक्रिया का पालन न करने के कारण एक योग्य चिकित्सक को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा। यह घटना चिकित्सा जगत के लिए एक चेतावनी है कि डॉक्टरों को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक होना ही होगा।

भविष्य की राह: संतुलित जवाबदेही

संगठन ने समाज के विभिन्न वर्गों के लिए सुझाव जारी किए हैं: पुलिस एजेंसियों के लिए: गिरफ्तारी या FIR से पहले सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन्स का कड़ाई से पालन करें। डॉक्टरों के लिए: कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक रहें, पारदर्शी संवाद करें और प्रॉपर डॉक्यूमेंटेशन (प्रलेखन) बनाए रखें।मीडिया के लिए: खबरों को सनसनीखेज बनाने से बचें और योग्य डॉक्टरों तथा झोलाछाप व्यक्तियों के बीच अंतर स्पष्ट करें।

 प्रतिकूल परिणाम हमेशा लापरवाही का प्रमाण नहीं होते। डॉक्टरों को अनुचित मुकदमों से सुरक्षा देना केवल उनके मनोबल की रक्षा नहीं है, बल्कि एक स्वस्थ और निर्भीक स्वास्थ्य प्रणाली के निर्माण के लिए आवश्यक है।

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