सूरत : ‘इमोशंस कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे मांगना पड़े’ : डॉ. निमित ओझा
SGCCI के ‘जीवन गणित’ सेमिनार में डॉ. ओझा ने किस्सों और फ़ॉर्मूलों के ज़रिए समझाया ‘इमोशंस का मैथमेटिक्स’
सदर्न गुजरात चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (SGCCI) द्वारा आयोजित लोकप्रिय और अनोखे सेमिनार श्रृंखला ‘जीवन गणित’ के तहत शनिवार, 10 जनवरी को शाम 5:00 बजे समृद्धि में मशहूर लेखक और मोटिवेशनल स्पीकर डॉ. निमित ओझा का सत्र आयोजित किया गया। इस अवसर पर उन्होंने छोटे-छोटे किस्सों, उदाहरणों, फ़ॉर्मूलों और सिद्धांतों के माध्यम से ‘इमोशंस का मैथमेटिक्स’ विषय को रोचक अंदाज़ में प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम की शुरुआत में चैंबर के प्रेसिडेंट निखिल मद्रासी ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि ‘जीवन गणित’ सेमिनार सीरीज़ की सबसे बड़ी सफलता यह है कि समृद्धि के सभी हॉल हर सत्र में खचाखच भरे रहते हैं, जो लोगों की इस विषय में गहरी रुचि को दर्शाता है।
अपने संबोधन में डॉ. निमित ओझा ने कहा कि इमोशंस का मैथमेटिक्स सुनने में भले ही एक कॉन्ट्राडिक्शन लगे, क्योंकि भावनाओं का कोई तय गणित नहीं होता। मैथमेटिक्स में थ्योरम, प्रूफ़ और प्रिंसिपल्स होते हैं, लेकिन भावनाएँ ऊर्जा का रूप होती हैं। उन्होंने बताया कि भावनाओं के पाँच प्रमुख सिद्धांत होते हैं। कोई भी भावना स्थायी नहीं होती, बल्कि चलती हुई ऊर्जा ही भावना का रूप लेती है। हर भावना केवल 90 सेकंड तक रहती है, इसके बाद हम जो महसूस करते हैं, वह हमारी पकड़ की वजह से बना रहता है।
डॉ. ओझा ने किस्सों के ज़रिए समझाया कि दूसरा सिद्धांत यह है कि हम जो भावना यूनिवर्स में भेजते हैं, वही लौटकर हमारे पास आती है। तीसरा यूनिवर्सल सिद्धांत यह है कि भावनाएँ संक्रामक होती हैं। अगर कोई रो रहा हो, तो आसपास के लोग भी भावुक हो जाते हैं और अगर कोई हँस रहा हो, तो उसकी हँसी भी फैलती है। इस संदर्भ में उन्होंने एक प्रभावशाली कहानी भी साझा की।
उन्होंने कहा कि इंसान एक कमरे में रहता है, जबकि उसका ईगो पूरे घर में फैला रहता है। घर जितना बड़ा होगा, उसकी दीवारें उतनी ही मज़बूत होंगी। संतोष, करुणा और आभार — ये तीन भावनाएँ ऐसी हैं, जिन्हें अपनाने से जीवन अधिक संतुलित और सुखद बनता है।
डॉ. ओझा ने यह भी बताया कि भावनाएँ कोई ऐसी चीज़ नहीं हैं जिन्हें माँगना पड़े, बल्कि वे स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती हैं। प्यार की भाषा समझाते हुए उन्होंने कहा कि जैसे इन्वेस्टमेंट में सारे अंडे एक ही टोकरी में नहीं रखे जाते, वैसे ही भावनात्मक निवेश में भी संतुलन ज़रूरी है। उन्होंने भावनाओं से जुड़े कई इक्वेशन और फ़ॉर्मूले बताए और ऑडियंस को चर्चा में शामिल किया। इस दौरान उन्होंने यह भी कहा कि प्यार का उल्टा नफ़रत नहीं, बल्कि बेपरवाही होती है।
कार्यक्रम में चैंबर के ऑनरेरी ट्रेज़रर सी. मितेश मोदी ने वक्ता का परिचय कराया। चैंबर के पूर्व प्रेसिडेंट रूपिन पचीगर ने पूरे कार्यक्रम का संचालन किया और अंत में धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इस अवसर पर चैंबर के ग्रुप चेयरमैन दीपक कुमार सेठवाला, श्रीमती स्वातिबेन सेठवाला, महेश पमनानी सहित कई सदस्य उपस्थित रहे और उन्होंने डॉ. ओझा के साथ इमोशंस के मैथमेटिक्स पर एक रोचक चर्चा की।
