सूरत : महंगी हुई पतंगों के बीचे गिली हुई बांस की फसल कारणभूत, जानें

पतंग बनाने के कागज और लेबर कोस्ट में भी हुआ है इजाफा

14 जनवरी मकर संक्रांति का पर्व गुजरात और विशेषकर सूरत में पतंगोत्सव के रूप में मनाया जाता है। लोग सुबह से अपने मकानों की छतों पर चढ़ जाते हैं और गुड़ की चिक्की और ठेठ गुजराती व्यंजन उंधियु के चटकारे लेते हुए दिन भर पतंगें उड़ाते हैं। लेकिन लग रहा है कि इस बार पतंगों के प्रति क्रेज थोड़ा कम है। इसका एक कारण महंगी हुई पतंगें और कोरोना की तीसरी लहर भी है। जानकारों का मनना है कि इस बार पतंगों की कीमतों में भारी उछाल आया है। अनुमान के अनुसार इस बार पतंगें लगभग 35 प्रतिशत महंगी हुई हैं। इसके पीछे का कारण है पतंगों की बनावट में काम आने वाली बांस की लकड़ियां। 
मीडिया रिपोर्ट की मानें तो पतंगों में बांस की लकड़ियों का प्रयोग होता है जो मूल रूप से आसाम से सप्लाय होते हैं। आसाम से बांस कोलकाता पहुंचते हैं और वहां पतंगों की साईज के अनुसार पतली-पतली लकड़ियों के टुकड़े काटे जाते हैं। ये लकड़ियों के टिनखे फिर पतंगों का उत्पान करने वाले सूरत और अन्य जगहों के कारीगरों तक पहुंचते हैं। उत्तरायण से चार-पांच महीनों पहले ही पतंग कारोबारियों को सीजन के ऑर्डर मिलने शुरु हो जाते हैं। लेकिन इस बार बांस की फसल के गिले हो जाने की समस्या के कारण पतंग में काम आने वाली लकड़ियों की सप्लाई सीमित हो जाने से उत्पादन में कमी आई है। इतना ही नहीं पतंग बनाने में काम आने वाले कागज की सप्लाई भी कम होने से उत्पादन पर असर पड़ा है। लैबर कोस्ट भी इस बार बढ़ी है। अधूरे में पूरा, ठीक उत्तरायण से पूर्व कोरोना की तीसरी लहर आ गई है और प्रशासन ने कई प्रकार के प्रतिबंध भी लाद दिये हैं जिससे पतंगोत्सव पर एकत्रित होने वाली भीड़ पर लगाम लगने वाली है।
सूरत में प्रशासन ने छतों पर पतंगोत्सव के दौरान कम से कम भीड़ करने, मेहमानों को न बुलाने और डीजे न बजाने का फरमान किया है। एतिहात के तौर पर पतंगोत्सव के सार्वजनिक और सरकारी कार्यक्रम भी इस बार रद्द कर दिये गये हैं।

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