सूरत कपड़ा उद्योग : जानें क्यों बढ़ गई सादे लूम्स की डिमांड

वाटर जेट और रेपियर मशीनों के लिए लेनी पड़ती थी पोल्युशन कंट्रोल बोर्ड से पर्मिशन, लंबी कानूनी दांवपेच से बचने के लिए मुड़े पुराने मशीनों के तरफ

कोरोना संक्रमण के कारण सभी व्यापार उद्योग धीमी गति से आगे बढ़ रहे हैं, वहीं कपड़ा उद्योग की गाड़ी सही दिशा में आगे बढ़ रही है। सूरत के कपड़ा उद्योग में अब फिर से पुराने लूम्स मशीनों का वर्चस्व बढा है। वाटर जेट, रेपियर मशीनो के लिए पर्यावरण के कई नियमों का पालन करना होता है। इसलिए विवर्स एक बार फिर से पुराने लूम्स मशीन इंस्टॉल कर रहे हैं। 
जानकारों  के अनुसार प्रतिमाह 1000 सादा लूम्स मशीनों की मांग सूरत के कपड़ा बाजार में उत्पन्न हुई है। जीएसटी के समय में मंदी के कारण सूरत में एक लाख सादा लूम्स मशीन भंगार करके बेच दिए गए थे। फिर से उन्हीं की डिमांड हो रही है। बताया जा रहा है कि सादा लूम्स मशीनों पर कम कीमत वाले और मध्यम कीमत वाले कपड़े सरलता से  तैयार हो जाते हैं। साथ ही इन्हें लगाने के लिए विशेष कानूनी दांवपेच की जरूरत भी नहीं पड़ती। वॉटर जेट, एयर जेट मशीनों पर बनने वाले कपड़े में जो पानी इस्तेमाल किया जाता है उसके ट्रीटमेंट के लिए पोल्युशन कंट्रोल बोर्ड से मंजूरी लेनी पड़ती है। जिसके लिए काफी लंबी कानूनी दाँवपेंच का सामना करना पड़ता है।इसलिए विवर्स सादा लूम्स मशीनों की माँग कर रहे है। 
चेंबर ऑफ कॉमर्स के उपप्रमुख आशिष गुजराती ने कहा कि सादा लूम्स मशीनें सस्ती होने के कारण तथा कपड़ों की डिमान्ड होने से माँग बढ़ी है। कई बार तो 2 महीने तक की वेइटिंग की परिस्थिति भी बन जाती है। कपड़ा उद्यमी मयूर गोलवाला ने मीडिया को बताया कि मशीनों के साथ लूम्स मशीनों के साथ आरबीएमके तीन पन्ना वाले जैकेट मशीनों की भी मांग बढ़ी है।

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