तालिबानियों के सत्तारूढ़ होने से सूरत उत्पादित आर्ट सिल्क ड्रेस मटेरियल्स के 1500 करोड़ के निर्यात पर लगा ब्रेक

अफगानिस्तान में फंसे सूरत के कपड़ा व्यवसायियो के 200 करोड़ रुपए, वेलवेट, निटिंग , जॉरजट आधारित सलवार सूट व लेस का सालाना 1200-1500 करोड़ का निर्यात

सूरत 20 अगस्त 2021 । जब तालिबान मुक्त अफगान की सत्ता थी तो भारत-अफगानिस्तान के रिश्ते बड़े ही मधुर थे व भारत से बड़े पैमाने पर कपड़े का एक्सपोर्ट हो रहा था। अफगानिस्तान को टेक्सटाइल्स निर्यात में सिल्क सिटी सूरत की बड़ी भूमिका रही है। अफगानिस्तान व पाकिस्तान को आर्ट सिल्क आधारित सलवार सूट तथा ड्रेस मटेरियल्स का निर्यात कर रहे वी आर एंटरप्राइजेज के श्री अनिल रांका ने बताया कि अफगानिस्तान के काबुल व कंधार में लगभग 400 कपड़े के थोक व्यवसायी है और ये दोनों शहरों के व्यवसायी अफगानिस्तान के अन्य शहरों व गांवो को कपड़ा भेजते है,  सूरत से वर्क बेस ड्रेस मटेरियल्स व अधिकतया सलवार सूट चालान होता है। एक दौर था जब ऑल ऑवर व रेनियल प्रिंट बड़े पैमाने पर जाता था। श्री अनिल रांका ने बताया कि अफगानिस्तान में पिछले कुछ वर्षों से प्लेन वेल्वेट व जॉरजट के वेल्यू एडेड वर्क के सूट ज्यादा चालान होते रहे है, ये वर्क एम्ब्रॉयडरी, लेस, बॉर्डर, गोटा, किनारी, स्टोन, दालिया, डायमंड आदि हैंड व मशीन वर्क जैसे वेल्यू एडेड आधारित है।
श्री रांका के अनुसार काबुल-कंधार में 600 रु से अधिकतम 1300 रु का सलवार सूट बड़े पैमाने पर चालान होता है। हालांकि आगामी दिनों यानी ऑक्टोबर-नवम्बर में अफगानिस्तान में भरपूर सीजन का दौर था व सूरत के व्यवसायी अफगान में माल भेजने की तैयारी में ही थे कि वहां तालिबानियों ने सत्ता हथिया ली। अब वहां भय व डर के साए में कारोबार होना है व सूरत हो या अन्य मंडी से वहां अब कपड़ा चालान नही होना है। श्री रांका ने बताया कि सूरत के अनेक बड़े ड्रेस मटेरियल्स निर्माता जो कैटलॉग आधारित ट्रेड करते है वहां उन्होंने कंधार व काबुल में डीलर बना रखे है जहां कैटलॉग बेस पर बड़ा कारोबार होता हैं। जहां तक भुगतान का प्रश्न है तो वहां अनेक प्रतिष्ठित कारोबारी है जो समयनुसार पैमेंट भेज देते थे लेकिन कभी कभार ग्राहकी मंदी रहती या कोई अड़चन आ जाती तो पैमेंट कभी कभी एक माह की बजाय दो-तीन माह तक नही मिल पाता था।  
श्री रांका ने बताया कि एक दौर था जब पाकिस्तान में सलवार सूट पर वर्क होता था वो क्वालिटियाँ काबुल कंधार भेजी जाती थी लेकिन अब पाकिस्तान की बजाय सूरत का वेल्यू एडेड वर्क वहां पसन्द किया जाता हैं। श्री अनिल रांका ने बताया कि अनेकों अफगानी व्यापारी रूबरू खरीदी पर सूरत आते रहे है, एक व्यवसायी तो गत 11 जुलाई को ही अफगान के लिए गया व 23 को वहां पहुंचा है और वहां तालिबानी शासन के संकेत मिल गए थे। रांका ने बताया कि अब तो अफगानी व्यवसायी फोन तक अटेंड नही कर रहे हैं, जबकि उनकी खैरियत पूछने हेतु यहां से फोन किए जा रहे थे न कि बकाया रकम का तकादा करने हेतु।
अफगानिस्तान सलवार सूट का बड़ा ग्राहक-संजीव कपूर
पिछले कई दशकों से अन्य देशों के साथ अफगानिस्तान के ग्राहकों को निर्यात कर रहे एक्सपोर्टर श्री संजीव कपूर के अनुसार अफगानिस्तान में सलवार सूट की बड़ी डिमांड बनी रहती है। वहां सूट व निटेड आदि ड्रेस मटेरियल्स ही जाता है। अगर साड़ियां जाती भी है तो वहां उसके सूट ही बनाए जाते है जबकि पाकिस्तान में तो साड़ियां व लहंगे तथा दुपट्टे बड़े पैमाने पर जाते थे। अफगानिस्तान को जहां सूरत से सीधा माल चालान होता रहा हैं। वहीं वहां के लिए मुम्बई बड़ा सप्लायर्स है। हालांकि अब जो भी माल अफगान जाएगा वो दुबई के व्यापारियों के माध्यम से या फिर बांग्ला देश आदि के मार्ग से।
40 फिट वाले बड़े कंटेनरों में ठूंस ठूंस कर अफगानिस्तान जाता है ड्रेस मटेरियल्स-विनय पारेख
अफगानिस्तान सूरत के बड़े ग्राहकों में से एक है प्रति माह 100 से 125 करोड़ रु के कपड़े की अफगान के काबुल व कंधार की मंडियों को सीधी सप्लाई होती रही है। पहले लॉक डाउन से ही अफगानी मंडियों में व्यापार काफी कमजोर चल रहा था, आज भी सूरत के व्यापारियों के लगभग 200 करोड़ रु की उधार अफगानी मंडियों में बकाया है। श्री पारेख के अनुसार अफगानी व्यापारी 40 फिट वाले विशाल साइज के कंटेनर में ठूंस ठूंस कर सलवार सूट भिजाते रहे हैं। प्रत्येक कंटेनर में ढाई लाख मीटर तक ड्रेस मटेरियल्स भर कर चालान करते हैं। अधिकतर अफगानी व्यापारी कार्टून की बजाय प्लास्टिक बरदान में ड्रेस मटेरियल्स पैक कराते हैं ताकि उसे ठूंस ठूंस कर भरा जाए। श्री पारेख के अनुसार दुबई, ओमान, अफगानिस्तान, ईरान, आदि देश सूरत उत्पादित ड्रेस मटेरियल्स के बड़े ग्राहकों में गिने जाते है, भारत हो या विदेश सूरत के फेब्रिक्स के बड़े ग्राहकों में मुस्लिम बाहुल्य कस्बे- शहर व देश ही प्रमुख भूमिका में है।  
प्रतिकात्मक तस्वीर (Photo Credit : rvv.co.in)

पुलमावा हमले के बाद कारोबार घटा- रवि ओसवाल
अफगानिस्तान के व्यापारियों के साथ बड़े पैमाने पर कारोबार कर चुके श्री रवि ओसवाल ने बताया कि अफगान में हमारी चालानी तो पिछले दो ढाई वर्षों से बन्द ही है। लेकिन अफगान सूरत के बड़े ग्राहकों में से एक है, 2005 से 2015 तक के एक दशक में अफगानी व्यापारियों ने सूरत में बड़े पैमाने पर कपड़ा खरीदते रहे हैं।
2011 के दौर में अफगानी व्यापारियों ने उधार में कपड़ा खरीदना शुरू किया-कनक मेहता
आयुष फैशन के श्री कनक मेहता ने बताया कि वर्ष 2009-2010 में अफगानी व्यापारियों से सूरत का रिंग रोड गुलजार रहता था। वहां के व्यवसायी सूरत के होटलों या फिर कोई मकान किराए पर लेकर रहते थे। अफगानी व्यापारी फेमिली लेकर भी आते थे व 3-4 माह तक सूरत में रहते थे। हां 5-5 व्यापारी एक साथ सूरत की मंडी में नजर आते थे व ज्यादातर व्यापारी कंधार व काबुल के ही रहते थे। उस दौर में लिज्ज़ा फेब्रिक्स, 30×30, रशियन, सी×सी जैसी ऑल ओवर व गारमेंट आधारित क्वालिटियाँ के 250 से 800 रु तथा उसमें भी 250 से 500 की रेंज बड़े पैमाने पर चलन में थी। श्री कनक मेहता के अनुसार 2011 के बाद उधारी शुरू हुई व तभी से पैसा डूबना शुरू हुआ। कनक मेहता के अनुसार इस दौर में भी 4-5 अफगानी व्यवसायी सूरत में रुके हुए है व वहां वातावरण के सुधार  का इंतजार कर रहे हैं।
पाकिस्तान में वाया अफगानिस्तान कपडे की चालानी
पाकिस्तान में ड्यूटी ज्यादा रहने से वहां के व्यवसायी वाया अफगानी बंदरगाह से माल मंगाते व मिली भगत से पाकिस्तानी सीमा में ये माल आपूर्ति हो जाता था, बताया जाता है कि अगर अफगान में ढाई लाख रु ड्यूटी बनती है तो पाक सीधे भेजने पर वो ड्यूटी लगभग आठ से दस गुना ज्यादा लग जाती है, अतः अनेक पाकिस्तानी व्यापारी वाया अफगान के माल मंगाते रहे है, एक निर्यातक ने कहा कि 1200-1500 करोड़ के सालाना निर्यात में आधे से ज्यादा माल तो कराची, लाहौर, फैसलाबाद आदि पाकिस्तानी व्यवसायी का ही रहता है जो कि ड्यूटी बचाने की चक्कर मे वाया अफगानिस्तान व अफगानी व्यापारियों के नाम से मंगाया जाता है, ये उल्लेखनिय है कि पाकिस्तान की विभिन्न मंडियों में सूरत के आर्ट सिल्क आधारित ड्रेस मटेरियल्स, साड़ियां, लहंगे, वेश व दुपट्टो की बेतहाशा मांग रहती है और अब वे सारा माल दुबई से खरीद रहे हैं।
लुधियाना से सालाना 50 करोड़ के शॉल व स्वेटर की चालानी
भारत के लुधियाना मंडी से प्रति वर्ष 50 करोड़ रु की गर्म व लिनेन आदि की शॉलें व ऊनी आदि के स्वेटरों की चालानी होती रही है। हालांकि तालिबानी शासन के पश्चात करोड़ो के ऑर्डर रद्द कर दिए गए है व करोड़ो रु की उधारी फंस जाने का खतरा बना हुआ हैं। जिनेन्द्र निट वियर के श्री सूरज पींचा ने बताया कि करोड़ो रूपये के माल का ऑर्डर कैंसल होने का खतरा मंडरा गया हैं।  
(Photo : IANS)

भीलवाड़ा से सालाना 200 करोड़ की रही है चालानी
मोरया सूटिंग के किशोर वोहरा ने बताया कि भीलवाड़ा सूटिंग मंडी से तकरीबन एक दर्जन उत्पादक प्रति वर्ष 200 करोड़ का 2 करोड़ मीटर शूटिंग शर्टिंग भेजते थे जो कि पुरुषों के  पठानी पहनावे में उपयोग में आता था।
अब चीन व पाकिस्तान के कब्जे में रहेगा आर्ट सिल्क कपड़ा बाजार
जैसा कि सर्व विदित है कि चीन व पाकिस्तान तालिबानियों के खुले समर्थक है व चीन के ताजा बयान में वे तालिबानियों के प्रति हमदर्दी जता चुके है व पाक तो खुला समर्थन कर चुका है दूसरी और तालिबानियों ने भारत के लिए व्यापार आदान प्रदान के दरवाजे फिलहाल तो बन्द कर ही चुका है। अतः भारत के आयात निर्यात की गुंजाइश कम ही लगती है। सूत्रों की माने तो भारत का अफगान के साथ 11-12 हजार करोड़ रु का कुल ट्रेड है। जिसमें 10 से 12 प्रतिशत निर्यात हिस्सा सीधे रूप से अकेले सूरत का व अप्रत्यक्ष रूप से वाया मुम्बई, गांधीनगर दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद, बेंगलोर, कोचीन आदि मंडियों के सूरत का फेब्रिक्स किसी न किसी रूप में बड़े पैमाने से खपता है।
यही नही लुधियाना, भीलवाड़ा, तिरुपुर, पानीपत तथा देश की अन्य मंडियों का फेब्रिक्स, पगड़ी का कपड़ा, पठानी ड्रेस का मटेरियल्स व कपास का भी बड़ा हिस्सा है। एक दृष्टि से भारत के लिए बहुत बड़ा हिस्सा हाथ से चले जाने की आशंका बनी हुई है। अब ऐसा भी नही की सूरत का कपड़ा वाया दुबई, ओमान या और किसी मुस्लिम देश से आसानी से पार हो जाएगा, कारण इन दिनों दुबई से पाकिस्तान की और चालान होने वाले कपड़े को पाक बॉर्डर पर पूरी तलाशी से गुजरना पड़ रहा है। पार्सल तक खोल कर चेक किए जा रहे हैं कि कहीं दुबई या अन्य कंट्री के लेबल या स्टंपिंग से भारत का कपड़ा पार तो नही हो रहा है, तो जब पाकिस्तान का ये रवैया है तो तालिबानियों की नजर में भारत को और भी हेय दृष्टि से देखा जा रहा है।
एक व्यवसायी ने बताया कि सूरत उत्पादित वेल्यू एडेड आर्ट सिल्क ड्रेस मटेरियल्स की पाकिस्तान व अफगान में बेतहाशा मांग बनी हुई है। अतः सूरत के उत्पादक दुबई के ट्रेडरों को माल चालान कर रहे है।जो सूरत से दुबई होते हुए कराची आदि 50 से 60 दिन में वह भी पूरी जांच पड़ताल के बमुश्किल पहुंच पा रहा है। अतः गजब की डिमांड के बावजूद सूरत के उत्पादक असहाय है माल की आपूर्ति करने हेतु, बताया जाता है कि पाक बॉर्डर से गुजरने वाले टेक्सटाइल्स गुड्स को इस तरह की जांच पड़ताल से गुजरना पड़ रहा है कि मानो कपड़ा नही अफीम हेरोइन जा रहा हो। जबकि चीन से आयातित कपड़े के लिए वेलकम की स्थिति है। जब पाक की यह स्थिति है तो तालिबानियों के शासन वाले अफगान की मंडियों में भारतीय उत्पाद कैसे चालान किया जा सकेगा। दुबई या अन्य मार्गो से तो अब ये सूरत का बहुत बड़ा बाजार चीन के कब्जे में आ सकता है। वहीं वेल्यू एडेड वर्क में पाकिस्तान का दबदबा बन सकता है क्योंकि सूरत के रहते पाक का वेल्यू एडेड कारोबार लड़खड़ा गया था।
बहरहाल सूरत के लिए तालिबानियों की सत्ता दोहरे रूप से नुकसान दायक बनती नजर आ रही है क्योंकि अफगान के साथ साथ वाया वाया पाकिस्तान की और चालानी पर ब्रेक जो लग गया है। बताया जा रहा है कि तालिबानी सत्ता के रहते अफगान में व्यापार तो वैसा का वैसा चलता रहेगा लेकिन कपड़े में सूरत, लुधियाना, भीलवाड़ा, मुम्बई, तिरुपुर जैसी मंडियों का हिस्सा अब चीन, बांग्ला देश, वियतनाम, श्रीलंका तथा पाकिस्तान के हाथों में चला जायेगा।
गणपत भंसाली

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