कोरोना काल में आम आदमी को चोट, धन्नासेठों के बढ़ते नोट; रॉल्स रॉयस की बिक्री में इज़ाफ़ा

2020 के मुक़ाबले पहले त्रिमासिक समय में 62 प्रतिशत बढ़ी बिक्री

लग्जरी और प्रतिष्ठित कार कंपनी रॉल्स रॉयस ने अपने 116 साल के इतिहास में सबसे ज्यादा त्रिमासिक बिक्री कोरोना के इस विकट काल में दर्ज की है। कंपनी के अनुसार, जनवरी से मार्च 2021 के त्रिमासिक समय में कंपनी ने कुल 1380 कार की बिक्री की थी। जो कि 116 साल के कंपनी के इतिहास में सबसे ज्यादा है। 2020 के पहले क्वार्टर के मुक़ाबले इस बार कंपनी की बिक्री 62% तक बढ़ी है। 
इन 3 महीनों में कंपनी का कुलीनन मॉडल सबसे ज्यादा बिका है। इस मॉडल की अमेरिका में कीमत चार लाख डॉलर के आसपास है। जिसका भारतीय मुद्रा में मूल्य 7 करोड़ जितना होता है। यह कार 3 टन की एसयूवी है और अमेरिका एवं चीन में इस कार्य की सबसे ज्यादा बिक्री हुई है।
कोरोना काल में जहां एक तरफ सामान्य आदमी को दो समय खाने की किल्लत हो रही है, वहीं धन्ना सेठों की संपत्ति लगातार बढ़ रही है। जिसका सीधा फायदा रॉल्स रॉयस जैसी कंपनियों को हो रहा है। अन्य लग्जरी कार के मुक़ाबले रॉल्स रॉयस लिमिटेड मॉडल ही तैयार करती है। 2019 के पूरे साल में कंपनी ने 5152 कारें बेची थी। अभी भी कंपनी फुल सिर्फ और सिर्फ पांच प्रकार के मॉडल बनाती है। रोल्स रॉयस को अपनी रॉयल कारों के लिए जाना जाता है। 
एक समय में पूरे जगत में रॉल्स रॉयस का दबदबा था और उसकी कार खरीदने के लिए राजा-महाराजा, देश के प्रमुख और उद्योगपतियों की लाइन लगती थी। कंपनी की बोलबाला इतनी थी कि किसे कार देनी है और किसे नहीं, वह खुद कंपनी ही निश्चित करती थी। इतिहास में रोल्स रॉयस से जुड़े कई किस्से सामने आते हैं। इसमें अलवर के महाराजा का किस्सा काफी प्रचलित है। 
साल 1920 में जब अलवर के महाराज जयसिंह ब्रिटेन गए थे, तब उन्होंने लंदन के रॉल्स रॉयस के शोरूम की मुलाकात लेनी चाही। पर उनका भारतीय चेहरा देखकर रंगभेद के मानने वाले गोरे सेल्समैन ने उन्हें कार बताने के लिए ही मना कर दिया। उसके बाद अलवर के महाराजा ने रॉल्स रॉयस की कारों को खरीद के भारत में इन कारों का इस्तेमाल कचरे को उठाने के लिए करने लगे। जिससे रॉल्स रॉयस की प्रतिष्ठा को काफी नुकसान पहुंचा। जिसके बाद कंपनी के अभिमानी मालिकों का गुमान उतरा और उन्होंने भारत आकर राजा की माफी मांगी थी। 

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