पालतू कुत्ते संपत्ति नहीं, परिवार का हिस्सा हैं: दिल्ली उच्च न्यायालय
नई दिल्ली, 01 जुलाई (वेब वार्ता)। दिल्ली उच्च न्यायालय ने पालतू जानवरों के अधिकारों और उनके संरक्षण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि पालतू कुत्तों को केवल संपत्ति के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि वे परिवार का अभिन्न हिस्सा होते हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में स्वामित्व से अधिक महत्व जानवरों के कल्याण और उनके भावनात्मक जुड़ाव को दिया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया की पीठ ने निचली अदालत के आदेश में संशोधन करते हुए तीन टॉय पोमेरेनियन नस्ल के कुत्तों—मिष्टी, कोको और कॉटन—को उन्हें गोद लेने वाले लोगों की अभिरक्षा मं् सौंपने का निर्देश दिया। न्यायालय ने कहा कि किसी पालतू जानवर को उस व्यक्ति से अलग करना, जिसके साथ उसका गहरा भावनात्मक संबंध बन चुका हो, उसके लिए मानसिक आघात का कारण बन सकता है।
मामले की शुरुआत उस समय हुई थी जब पुलिस ने पशु क्रूरता निवारण कानून के तहत एक परिसर में छापेमारी कर कई कुत्तों को कथित रूप से खराब परिस्थितियों में पाया। इसके बाद इन जानवरों को एक गैर-सरकारी संस्था के सुपुर्द किया गया, जिसने तीन कुत्तों को इच्छुक व्यक्तियों को गोद दे दिया।
बाद में एक व्यक्ति ने स्वयं को इन कुत्तों का वास्तविक मालिक बताते हुए निचली अदालत में अस्थायी अभिरक्षा की मांग की। निचली अदालत ने उसकी याचिका स्वीकार करते हुए कुत्तों को उसे सौंपने का आदेश दिया था। इस आदेश को गोद लेने वाले लोगों ने दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि पालतू जानवरों की अभिरक्षा का निर्धारण किसी निर्जीव वस्तु के स्वामित्व विवाद की तरह नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में यह देखना आवश्यक है कि जानवर का हित किसमें है और उसका भावनात्मक जुड़ाव किसके साथ अधिक मजबूत है।
दोनों पक्षों की सहमति के आधार पर न्यायालय ने तीनों कुत्तों को गोद लेने वाले लोगों की सुपरदारी में सौंपने का आदेश दिया। साथ ही प्रत्येक मामले में 50 हजार रुपये का बांड जमा कराने और मुकदमे की आवश्यकता पड़ने पर कुत्तों को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय पालतू जानवरों के अधिकारों और उनके कल्याण को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित होगा। अदालत की यह टिप्पणी भविष्य में पालतू जानवरों की अभिरक्षा से जुड़े मामलों में मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में देखी जा सकती है।
