सूरत : पत्नी की मानसिक क्रूरता को माना तलाक का आधार, अंकलेश्वर फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में सुनाया फैसला

लगातार मानसिक प्रताड़ना, वैवाहिक संबंधों में टूटन और सहयोगहीन व्यवहार को कोर्ट ने माना गंभीर; 16 अप्रैल 2026 को विवाह विच्छेद की डिक्री पारित

सूरत : पत्नी की मानसिक क्रूरता को माना तलाक का आधार, अंकलेश्वर फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में सुनाया फैसला

सूरत। अंकलेश्वर फैमिली कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में पत्नी द्वारा पति के प्रति कथित मानसिक प्रताड़ना, असहयोग और क्रूर व्यवहार को तलाक का पर्याप्त आधार मानते हुए पति की याचिका स्वीकार कर ली है।

अंकलेश्वर फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(i-a) के तहत विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करते हुए कहा कि दोनों पक्षों के बीच वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट चुके हैं और उनके पुनर्स्थापित होने की कोई संभावना नहीं है।

मामले के अनुसार, अंकलेश्वर के जीआईडीसी रोड क्षेत्र निवासी महेश पटेल का विवाह वर्ष 2011 में जामजोधपुर निवासी नेहाबेन के साथ हिंदू रीति-रिवाजों से हुआ था। दोनों का यह दूसरा विवाह था। दंपति के एक पुत्र और एक पुत्री हैं।

पति ने अदालत में दायर याचिका में आरोप लगाया था कि विवाह के कुछ समय बाद ही पत्नी का व्यवहार बदल गया और वह संयुक्त परिवार में रहने को तैयार नहीं थी। इसके बाद अलग रहने की व्यवस्था किए जाने के बावजूद पारिवारिक विवाद और तनाव लगातार बढ़ते गए।

याचिका में यह भी कहा गया कि पत्नी घरेलू जिम्मेदारियों और बच्चों की देखभाल के प्रति उदासीन रही तथा छोटी-छोटी बातों पर पति और परिवार के सदस्यों से विवाद करती थी।

पति के अनुसार, अगस्त 2021 से वैवाहिक संबंध पूरी तरह समाप्त हो गए थे और दोनों केवल एक ही घर में अलग-अलग जीवन व्यतीत कर रहे थे। इससे वह मानसिक तनाव और अवसाद का शिकार हो गया, जिसके उपचार के लिए उसे चिकित्सकीय सहायता लेनी पड़ी।

अदालत के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार, वर्ष 2023 में समाज के अग्रणियों की मौजूदगी में समझौते का प्रयास किया गया था, जिसमें पत्नी ने कथित रूप से अपने व्यवहार में सुधार का आश्वासन दिया था।

हालांकि बाद में यह समझौता सफल नहीं हो सका। पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी बिना सूचना घर छोड़कर चली गई और पुलिस में शिकायत दर्ज कराकर उसे परेशानी का सामना करना पड़ा।

मामले की सुनवाई के दौरान पत्नी अदालत में उपस्थित नहीं हुई और न ही उसने कोई लिखित जवाब दाखिल किया। इसके चलते न्यायालय ने मामले की एकतरफा सुनवाई की। अदालत ने पति की गवाही, स्वतंत्र गवाह के बयान, चिकित्सा दस्तावेजों और अन्य प्रस्तुत साक्ष्यों पर विचार किया।

फैमिली कोर्ट के न्यायाधीश आर. आर. देसाई ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि पति मानसिक क्रूरता का शिकार हुआ है।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि पति अंतरिम अवधि में पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण के लिए प्रति माह 10,000 रुपये का भुगतान कर अपनी जिम्मेदारी निभाता रहा, जो उसके सद्भाव और उत्तरदायित्व को दर्शाता है।

अदालत ने माना कि वर्ष 2021 से दंपति के बीच वैवाहिक संबंध प्रभावी रूप से समाप्त हो चुके थे और विवाह का उद्देश्य ही खत्म हो गया था। इसी आधार पर 16 अप्रैल 2026 को विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर विवाह संबंध को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया गया।

मामले में याचिकाकर्ता पति की ओर से अधिवक्ता प्रीति जिग्नेश जोशी ने पैरवी की।

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