सूरत : श्रीमद्भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन का दर्पण : राधेश्याम शास्त्रीजी

श्री शक्ति धाम सेवा समिति के आयोजन में तीसरे दिन उमड़े श्रद्धालु, भागवताचार्य ने भक्ति और धर्म आचरण का दिया संदेश

सूरत : श्रीमद्भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन का दर्पण : राधेश्याम शास्त्रीजी

 श्री शक्ति धाम सेवा समिति द्वारा श्री राणी सती दादी मंदिर के रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में पुरुषोत्तम मास के अवसर पर आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन गुरुवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा का श्रवण किया। सिटी लाइट स्थित महाराजा अग्रसेन पैलेस के पंचवटी हॉल में 9 से 15 जून तक चल रहे इस धार्मिक आयोजन में भक्तों का उत्साह देखने को मिला।

कथा के मुख्य यजमान परिवार ने व्यासपीठ का पूजन एवं आरती कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। वहीं समिति के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने भागवताचार्य राधेश्याम शास्त्री का माल्यार्पण कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

व्यासपीठ से कथा का रसपान कराते हुए भागवताचार्य राधेश्याम शास्त्री ने ध्रुव चरित्र, राजा पृथु के प्रसंग और जीवन में सत्संग के महत्व का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने भक्त ध्रुव की कथा सुनाते हुए कहा कि मात्र पांच वर्ष की आयु में ध्रुव ने सांसारिक अपमान के बाद वन में जाकर कठोर तपस्या की और भगवान विष्णु की कृपा से अमर पद प्राप्त किया। यह प्रसंग संदेश देता है कि दृढ़ संकल्प और अटूट भक्ति के बल पर असंभव कार्य भी संभव हो सकते हैं।

महाराजजी ने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन का दर्पण है। इसके प्रत्येक चरित्र से प्रेरणा लेकर जीवन में अच्छे संस्कार और धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति परम कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ता है। उन्होंने भगवान शिव के परिवार का उदाहरण देते हुए कहा कि जहां विषमता में भी समता दिखाई देती है, वहां ईश्वर की कृपा होती है। भगवान सभी ग्रहों के स्वामी हैं, इसलिए उनकी भक्ति जीव के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।

कथा के दौरान मधुर भजनों की प्रस्तुति ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। “भला किसी का किया नहीं तो बुरा किसी मत करना”, “श्याम तुझसे मिलने का सत्संग ही बहाना है”, “दुनिया क्या जाने मेरा रिश्ता पुराना है”  “आ जा आ जा रे कन्हैया तेरी याद आई” जैसे भजनों पर श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूम उठे।

भागवताचार्य ने कहा कि जिनके घर में गुरुदेव और संतों का आगमन होता है, वहां प्रभु की कृपा मानी जाती है। जिस परिवार में संतान धार्मिक संस्कारों के साथ पूजा-पाठ करती है, उसका जीवन मंगलमय होता है। उन्होंने कहा कि जिस घर में धर्म, पूजा-पाठ और रामायण-गीता जैसे ग्रंथों का अध्ययन नहीं होता, वह घर आध्यात्मिक रूप से सूना हो जाता है। सत्संग और धर्म आचरण के बिना जीवन रूपी नैया को पार करना कठिन है।

समाज में बढ़ती विकृतियों पर प्रकाश डालते हुए शास्त्रीजी ने कहा कि आज लोग जन्मदिन जैसे अवसरों को उत्सव के रूप में मनाते हैं, लेकिन जीवन की वास्तविकता को समझना आवश्यक है। उन्होंने बलि प्रथा पर कहा कि मनुष्य को किसी अबोल जीव की बलि देने के बजाय अपने भीतर के काम, क्रोध और ईर्ष्या जैसे विकारों का त्याग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि परमात्मा और जीवात्मा का संबंध अटूट है तथा परमात्मा को भूल जाना ही दुखों का मुख्य कारण है। आयोजन समिति के अनुसार शुक्रवार को कथा में गजेंद्र मोक्ष और श्रीराम जन्मोत्सव के प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया जाएगा।

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