सूरत : बदलती जीवनशैली से घुटनों की समस्याएं पांच गुना बढ़ीं: विशेषज्ञ
SGCCI की हेल्थ सीरीज़ में घुटनों के दर्द, बचाव और आधुनिक उपचार पर विशेषज्ञों ने दी महत्वपूर्ण जानकारी
सूरत। सदर्न गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (SGCCI) की पब्लिक हेल्थ कमेटी द्वारा आयोजित लोक जागृति हेल्थ सीरीज़ के 41वें कार्यक्रम में घुटनों के दर्द और उसके आधुनिक उपचार विषय पर विशेष सेमिनार आयोजित किया गया।
कार्यक्रम में सूरत के प्रसिद्ध SEEDS हॉस्पिटल के ऑर्थोपेडिक एवं रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जन डॉ. चिन्मय देसाई ने मुख्य वक्ता के रूप में घुटनों की बीमारियों के बढ़ते मामलों, उनके कारणों और उपचार के विभिन्न विकल्पों पर विस्तार से जानकारी दी।
कार्यक्रम की शुरुआत में SGCCI के अध्यक्ष निखिल मद्रासी ने कहा कि हेल्थ सीरीज़ का उद्देश्य लोगों में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता बढ़ाना और उन्हें बीमारियों से बचाव के प्रति शिक्षित करना है। उन्होंने पब्लिक हेल्थ कमेटी की चेयरपर्सन पारुलबेन वडगामा के योगदान की भी सराहना की।
युवाओं में भी बढ़ रही हैं घुटनों की समस्याएं
डॉ. चिन्मय देसाई ने बताया कि बदलती जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियों में कमी, बढ़ता मोटापा और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का अत्यधिक सेवन घुटनों की समस्याओं के प्रमुख कारण बन रहे हैं। उन्होंने कहा कि पिछले 10 वर्षों में घुटनों से जुड़ी बीमारियों के मामलों में लगभग पांच गुना वृद्धि दर्ज की गई है।
उन्होंने बताया कि पहले घुटनों का आर्थराइटिस सामान्यतः 50 वर्ष की आयु के बाद देखने को मिलता था, लेकिन अब यह समस्या 30 से 40 वर्ष की उम्र में ही सामने आने लगी है। कई मामलों में किशोरों और युवाओं में भी घुटनों की तकलीफ देखी जा रही है। इसके अलावा चोट, संक्रमण, मांसपेशियों की कमजोरी और आर्थराइटिस भी दर्द के प्रमुख कारण हैं।
घुटनों के दर्द के तीन चरण
डॉ. देसाई ने घुटनों के दर्द को तीन प्रमुख चरणों में विभाजित किया:
प्रारंभिक चरण: दर्द कभी-कभी होता है और आराम करने से ठीक हो जाता है।
मध्यम चरण: दर्द नियमित रूप से महसूस होता है, लेकिन दैनिक गतिविधियां प्रभावित नहीं होतीं।
उन्नत चरण: दर्द असहनीय हो जाता है और चलने-फिरने तथा जीवन की गुणवत्ता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
वजन कम करना और फिजियोथेरेपी सबसे प्रभावी उपाय
उन्होंने बताया कि फिजियोथेरेपी घुटनों के उपचार की आधारशिला है, क्योंकि इससे मांसपेशियां मजबूत होती हैं और जोड़ों पर पड़ने वाला दबाव कम होता है। यदि कोई व्यक्ति अपने शरीर का केवल 5 प्रतिशत वजन भी कम कर ले, तो घुटनों पर पड़ने वाला भार कई गुना तक घटाया जा सकता है।
दवाओं और व्यायाम से राहत नहीं मिलने पर स्टेरॉयड, हाइलूरोनिक एसिड और पीआरपी (PRP) इंजेक्शन जैसे विकल्प अपनाए जा सकते हैं, जिनका प्रभाव आमतौर पर तीन से छह महीने तक रहता है।
आधुनिक सर्जरी और रोबोटिक तकनीक का बढ़ता उपयोग
डॉ. देसाई ने बताया कि जब दर्द के कारण सामान्य दिनचर्या प्रभावित होने लगे, तब सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है। वर्तमान में ऑस्टियोटॉमी, पार्शियल नी रिप्लेसमेंट और टोटल नी रिप्लेसमेंट जैसी आधुनिक सर्जिकल तकनीकें उपलब्ध हैं।
रोबोटिक सर्जरी के बारे में उन्होंने कहा कि इससे ऑपरेशन में अधिक सटीकता मिलती है और मरीज की रिकवरी अपेक्षाकृत तेज होती है। हालांकि, एक वर्ष बाद पारंपरिक और रोबोटिक सर्जरी के परिणाम लगभग समान पाए जाते हैं।
शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करें
डॉ. देसाई ने नागरिकों से अपील की कि घुटनों के दर्द के शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करें और किसी भी उपचार के लिए केवल योग्य एवं विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह लें। उन्होंने यह भी कहा कि शराब और धूम्रपान जैसी आदतें हड्डियों के स्वास्थ्य और रिकवरी प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं, इसलिए इनसे दूर रहना आवश्यक है।
कार्यक्रम के अंत में प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया, जिसमें उपस्थित लोगों ने घुटनों के दर्द, इंजेक्शन थेरेपी, सर्जरी और रिकवरी से जुड़े विभिन्न प्रश्न पूछे। डॉ. चिन्मय देसाई ने सभी सवालों के विस्तृत और विशेषज्ञतापूर्ण उत्तर दिए।
