द्रविड़ का करियर बचाने उन्हें विकेटकीपर की भी जिम्मेदारी दी थी : गांगुली

द्रविड़ का करियर बचाने उन्हें विकेटकीपर की भी जिम्मेदारी दी थी : गांगुली

कोलकाता, 18 मई (वेब वार्ता)। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली ने कहा है कि साल 2003 एकदिवसीय विश्वकप से पहले राहुल द्रविड़ को टीम में रखने पर सवाल उठने लगे थे पर उस समय उन्होंने चयनकर्ताओं के खिलाफ जाकर उन्हें टीम में बनाये रखा था। इसके लिए उन्हें टीम का ढ़ांच तक बदलना पड़ा था। इसी के तहत ही द्रविड़ को विकेटकीपर की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई।

गांगुली के अनुसार, 2000 के दशक की शुरुआत में, विशेष रूप से 2003 विश्व कप से पहले द्रविड़ की एकदिवसीय टीम में जगह को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे थे।

चयनकर्ता और विशेषज्ञ उनके स्ट्राइक रेट से संतुष्ट नहीं थे। ऐसे में कहा जा रहा था कि द्रविड की जगह किसी और खिलाड़ी को मौका दिया जाना चाहिए पर मैंने उन्हें नहीं छोड़ा, क्योंकि अगर मैंने उन्हें छोड़ दिया होता, तो उनका करियर समाप्त हो सकता था।

इस हालात में गांगुली ने एक साहसिक फैसला लेकर न केवल द्रविड़ का करियर बचाया बल्कि भारतीय टीम को एक नई दिशा भी दी। उस समय टीम को एक ऐसे विकेटकीपर-बल्लेबाज की सख्त जरूरत थी जो मध्य क्रम में बल्लेबाजी कर सके। गांगुली ने इस समस्या को समझाते हुए कहा कि द्रविड़ को विकेटकीपर की भी जिम्मेदारी दी।

तब के समय में श्रीलंका के पास कुमार संगकारा, दक्षिण अफ्रीका के पास मार्क बाउचर और ऑस्ट्रेलिया के पास एडम गिलक्रिस्ट जैसे बेहतरीन विकेटकीपर-बल्लेबाज थे, जबकि भारत की बल्लेबाजी छठे नंबर पर समाप्त हो जाती थी। इस कमी को पूरा करने के लिए, गांगुली ने द्रविड़ को मध्य क्रम में बल्लेबाजी के साथ-साथ विकेटकीपिंग की जिम्मेदारी भी सौंपी।

यह फैसला भारतीय क्रिकेट के लिए सफल रहा। इस कदम से न केवल टीम को मजबूती मिली और बल्लेबाजी का क्रम निचले पायदान तक बढ़ गया, जिससे सातवें नंबर पर मोहम्मद कैफ जैसे बल्लेबाज को मौका देना संभव हो सका। गांगुली ने यह भी बताया कि उस समय भारतीय टीम में ऑलराउंडरों की भी कमी थी।

उन्होंने कहा, हमारे पास उस तरह का ऑलराउंडर नहीं था। इसलिए वीरेन्द्र सहवाग से लेकर सचिन तेंदुकर और युवराज सिंह के अलावा मैंने भी गेंदबाजी की। यह दर्शाता है कि उस दौर में टीम को संतुलन प्रदान करने के लिए कितने प्रकार के प्रयासों की जरुरत थी।

द्रविड़ ने कई सालों तक इस दोहरी जिम्मेदारी को बखूबी निभाया और अपनी शानदार बल्लेबाजी और भरोसेमंद विकेटकीपिंग से टीम के लिए अमूल्य योगदान दिया।

हालांकि, बाद में जब महेंद्र सिंह धोनी विकेटकीपर के तौर पर टीम में शामिल हुए तो विकेटकीपिंग की समस्या स्थाई रूप से हल हो गई और धोनी ने लगभग डेढ़ दशक तक विकेट के पीछे से भारतीय क्रिकेट की बागडोर संभाली।