सूरत : सोने के आयात शुल्क बढ़ाने के फैसले पर जीजेईपीसी ने जताई चिंता
एमएसएमई ज्वेलरी उद्योग पर असर की आशंका, सरकार से टिकाऊ समाधान और निर्यात प्रोत्साहन की मांग
सूरत। जेम एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (जीजेईपीसी) ने सोने के आयात शुल्क को 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत और कृषि उपकर को 1 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत किए जाने के सरकार के फैसले पर गंभीर चिंता जताई है।
परिषद ने कहा कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘राष्ट्र प्रथम’ के आह्वान के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है, लेकिन शुल्क वृद्धि से उद्योग, विशेषकर एमएसएमई क्षेत्र, पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है।
जीजेईपीसी ने बताया कि हाल ही में प्रमुख ज्वेलरी रिटेलर्स और निर्माताओं के साथ बैठक आयोजित कर प्रधानमंत्री को एक पत्र भेजा गया है, जिसमें सोने के आयात को कम करने और आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए उद्योग द्वारा उठाए जा रहे कदमों की जानकारी दी गई है।
परिषद ने कहा कि कम कैरेट वाले आभूषण जैसे 18 कैरेट और 14 कैरेट ज्वेलरी को बढ़ावा देकर सोने के आयात में 20 से 30 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। इसके अलावा उपभोक्ताओं को पुराने सोने के बदले नए आभूषण बनवाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे आयात पर निर्भरता घटेगी।
जीजेईपीसी ने ‘गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम’ (जीएमएस) को अधिक व्यावहारिक स्वरूप में फिर से लागू करने की भी मांग की है, ताकि देश में मौजूद लगभग 25,000 टन स्वर्ण भंडार का बेहतर उपयोग हो सके।
परिषद ने सोने की छड़ों, बिलेट्स और सिक्कों में निवेश को हतोत्साहित करने की भी बात कही, क्योंकि कुल आयात में इनका हिस्सा 20 से 30 प्रतिशत तक है।
परिषद ने कहा कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में सोने के आभूषणों के निर्यातकों को विशेष प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए, ताकि वे अधिक विदेशी मुद्रा अर्जित कर सकें। जीजेईपीसी ने सरकार को जीएमएस को पुनर्जीवित करने संबंधी विस्तृत प्रस्ताव भी सौंपने की जानकारी दी।
हालांकि, परिषद ने स्पष्ट किया कि उसका हमेशा से मानना रहा है कि आयात शुल्क बढ़ाने से सोने का आयात कम नहीं होता, बल्कि इससे कीमतों में वृद्धि और तस्करी को बढ़ावा मिलता है। जीजेईपीसीके अनुसार, हाल के वर्षों में सोने की कीमतें दोगुनी होने के बावजूद आयात में उसी अनुपात में कमी नहीं आई है।
परिषद ने यह भी बताया कि निर्यातकों को अब शुल्क-मुक्त सोने के लिए ‘नामित एजेंसियों’ को प्रति किलोग्राम 28 से 30 लाख रुपये तक की बैंक गारंटी देनी पड़ रही है, जिससे उनकी कार्यशील पूंजी पर भारी दबाव पड़ रहा है और निर्यात कारोबार प्रभावित हो रहा है।
जीजेईपीसी ने चेतावनी दी कि इस नीति का सबसे अधिक असर एमएसएमई निर्माताओं पर पड़ेगा, जो उद्योग की रीढ़ माने जाते हैं। परिषद की कुल सदस्यता में लगभग 80 प्रतिशत हिस्सेदारी एमएसएमई क्षेत्र की है और वर्तमान में वे गंभीर नकदी संकट का सामना कर रहे हैं।
परिषद ने सरकार से आग्रह किया कि वह ऐसे दीर्घकालिक और संतुलित समाधान तलाशे, जिनसे राजकोषीय लक्ष्यों के साथ-साथ निर्यात वृद्धि और उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता भी सुरक्षित रह सके।
