सूरत : कीम स्टेशन हादसा मामला, गुजरात हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, अजन्मे बच्चे को भी माना ‘व्यक्ति’
2018 रेल हादसे में गर्भवती महिला और भ्रूण की मौत पर परिवार को मिलेगा अलग मुआवजा, कोर्ट ने रेलवे को 8 लाख रुपये ब्याज सहित देने का आदेश दिया
सूरत। गुजरात हाई कोर्ट ने सूरत के कीम रेलवे स्टेशन पर वर्ष 2018 में हुए दर्दनाक रेल हादसे से जुड़े मामले में मानवता और संवेदनशीलता से जुड़ा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
अदालत ने गर्भ में पल रहे अजन्मे बच्चे को भी कानूनी पहचान देते हुए उसके परिवार को 9 प्रतिशत ब्याज सहित 8 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। गुजरात रेलवे इतिहास में इसे अपने तरह का पहला महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है।
जानकारी के अनुसार, मध्य प्रदेश निवासी जयप्रकाश घसीटालाल अपनी पत्नी उषाबेन और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ 14 अप्रैल 2018 को कानपुर जाने के लिए कीम रेलवे स्टेशन पहुंचे थे। ट्रेन में चढ़ने के दौरान हुए हादसे में नौ महीने की गर्भवती उषाबेन की मौत हो गई थी। हादसे में गर्भ में पल रहे बच्चे की भी जान चली गई थी।
घटना के बाद मृतका के पति ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल में दो अलग-अलग मुआवजा दावे दायर किए थे। ट्रिब्यूनल ने महिला की मौत के लिए 8 लाख रुपये का मुआवजा मंजूर किया, लेकिन अजन्मे बच्चे के लिए मुआवजा देने से इनकार कर दिया था। ट्रिब्यूनल का कहना था कि भ्रूण को कानूनन ‘व्यक्ति’ नहीं माना जा सकता।
इसके खिलाफ परिवार ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। परिवार की ओर से अधिवक्ता नितिन कपाड़े ने दलील दी कि पांच महीने से अधिक आयु के भ्रूण को कानून में अलग पहचान प्राप्त है और उसे व्यक्ति माना जाना चाहिए।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जे.सी. दोशी ने परिवार की दलीलों को स्वीकार किया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अजन्मे बच्चे का भी स्वतंत्र अस्तित्व और अधिकार होता है।
इसी आधार पर अदालत ने रेलवे प्रशासन को तीन सप्ताह के भीतर बच्चे के पिता को 9 प्रतिशत ब्याज सहित 8 लाख रुपये का मुआवजा अदा करने का निर्देश दिया।
कानूनी विशेषज्ञ इस फैसले को अजन्मे बच्चों के अधिकारों और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय मान रहे हैं।
