सूरत : 100 वर्षीय नानुबेन राजपरा का प्रेरणादायक विदाई: नेत्रदान, देहदान और रक्तदान शिविर से दिया मानवता का संदेश

अंतिम यात्रा बनी सेवा का प्रतीक, 43 यूनिट रक्त संग्रह के साथ समाज को मिली नई दिशा

सूरत : 100 वर्षीय नानुबेन राजपरा का प्रेरणादायक विदाई: नेत्रदान, देहदान और रक्तदान शिविर से दिया मानवता का संदेश

मानवता और सेवा का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हुए 100 वर्षीय नानुबेन झवेरभाई राजपरा के निधन के उपरांत उनके परिवार द्वारा नेत्रदान और देहदान जैसे पुण्य कार्य संपन्न किए गए। साथ ही उनकी स्मृति में एक रक्तदान शिविर का आयोजन भी किया गया, जिसमें 43 यूनिट रक्त एकत्रित हुआ।

मूल रूप से ढसा (तालुका गढ़ड़ा, जिला बोटाद) की निवासी नानुबेन का निधन सूरत के अवध पल्स बेरी सोसायटी में हुआ। उनके पुत्र अशोकभाई और जयंतिभाई द्वारा डॉ. प्रफुलभाई शिरोया को सूचना देने पर लोक दृष्टि चक्षुबैंक के माध्यम से नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी की गई। इसके बाद इंडियन रेड क्रॉस सोसायटी, चोर्यासी शाखा द्वारा उनका देह नई सिविल अस्पताल को समर्पित किया गया।

इस सेवा कार्य में लोक दृष्टि चक्षुबैंक के उपाध्यक्ष दिनेशभाई जोगाणी, किसान संघ के विशालभाई वाघाणी तथा डॉ. राज किशोर बहेरा ने महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया। परिवारजनों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों और मित्रों की उपस्थिति में यह पुण्य कार्य संपन्न हुआ।

अंतिम यात्रा के दौरान नानुबेन के पार्थिव शरीर को ढोल-नगाड़ों के साथ नई सिविल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉ. भारतीबेन मैसूरिया द्वारा देहदान स्वीकार किया गया। इस अवसर पर लोक दृष्टि चक्षुबैंक के ट्रस्टियों, रेड क्रॉस सोसायटी चोर्यासी तालुका के सदस्यों, लायंस क्लब ऑफ सूरत ईस्ट के अध्यक्ष किशोरभाई मंगरोलिया और जोन चेयरमैन जगदीशभाई बोदरा सहित कई गणमान्य लोगों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।

दिनेशभाई जोगाणी ने बताया कि मृत्यु के छह घंटे के भीतर नेत्रदान करने से 72 घंटे के अंदर दो या अधिक व्यक्तियों के जीवन में रोशनी लाई जा सकती है। वहीं, डॉ. शिरोया ने जानकारी दी कि कुछ समय पूर्व आयोजित अंगदान जागरूकता कार्यक्रम में नानुबेन ने परिवार की सहमति से देहदान का संकल्प लिया था।

विशेषज्ञों के अनुसार, देहदान से मेडिकल विद्यार्थियों को शरीर की आंतरिक संरचना के अध्ययन और शोध कार्य में सहायता मिलती है, जिससे बेहतर चिकित्सकों का निर्माण होता है और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूती मिलती है। इस प्रेरणादायक पहल के माध्यम से राजपरा परिवार ने समाज को यह संदेश दिया कि “जीते जी रक्तदान करें और मृत्यु के बाद नेत्र, देह एवं अंगदान करें — यही सर्वोत्तम दान है।”

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