सूरत : ओलपाड में नेचुरल एग्रीकल्चर सेमिनार: राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने किसानों को ‘बैक टू नेचर’ का दिया संदेश
केमिकल खेती को बताया गंभीर खतरा; किसानों से कम से कम एक हिस्से में प्राकृतिक खेती शुरू करने की अपील
सूरत। ओलपाड तालुका के जिनोद गांव में आयोजित नेचुरल एग्रीकल्चर सेमिनार में आचार्य देवव्रत ने किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने का आह्वान करते हुए ‘बैक टू नेचर’ का संदेश दिया। सेमिनार का आयोजन पुरुषोत्तम जिन फार्मर्स कंपाउंड में किया गया, जहां बड़ी संख्या में किसान और कृषि विशेषज्ञ उपस्थित रहे।
सेमिनार के दौरान राज्यपाल ने कहा कि वर्तमान समय में केमिकल आधारित खेती केवल व्यवसाय नहीं रह गई है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। उन्होंने कहा कि अत्यधिक रासायनिक खाद और कीटनाशकों के उपयोग से जमीन की उर्वरता घट रही है और यह जहर खाद्य पदार्थों के माध्यम से मानव शरीर तक पहुंच रहा है।
उन्होंने एक शोध का हवाला देते हुए बताया कि हाल ही में किए गए परीक्षणों में माताओं के दूध में भी रसायनों के अंश पाए गए हैं, जो चिंताजनक स्थिति को दर्शाता है। उन्होंने इसे आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बताते हुए प्राकृतिक खेती को अपनाने पर जोर दिया।
राज्यपाल ने यह भी स्पष्ट किया कि प्राकृतिक खेती में कम उत्पादन होने की धारणा एक भ्रम है। अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि वे स्वयं हरियाणा के कुरुक्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्राकृतिक खेती कर रहे हैं, जिसमें रासायनिक उर्वरकों का उपयोग नहीं किया जाता और लागत भी बेहद कम होती है।
उन्होंने किसानों से अपील की कि वे शुरुआत में अपनी जमीन के एक छोटे हिस्से में प्राकृतिक खेती अपनाएं और धीरे-धीरे इसका विस्तार करें। साथ ही, देसी गाय आधारित खेती को जल संरक्षण, जैव विविधता और स्वस्थ समाज के लिए आवश्यक बताया।
सेमिनार में आत्मा (ATMA) कार्यालय के सहयोग से प्राकृतिक खेती से जुड़े उत्पादों के स्टॉल भी लगाए गए, जहां राज्यपाल ने किसानों से संवाद किया और उनके अनुभव जाने।
इस अवसर पर मुकेश दलाल, विधायक मुकेश पटेल सहित कृषि विभाग के अधिकारी, प्रगतिशील किसान और बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे। कार्यक्रम में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता और प्रशिक्षण पर भी जोर दिया गया।
यह सेमिनार सूरत जिले में प्राकृतिक खेती के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे किसानों को टिकाऊ और स्वास्थ्यप्रद कृषि पद्धतियों की ओर प्रेरित किया जा सके।
