सूरत  : आर्थिक शोषण लगातार अत्याचार, घरेलू हिंसा केस पर नहीं लागू होती समय सीमा- सूरत कोर्ट

पत्नी ने 5 साल बाद दायर की अर्जी, पति की ‘टाइम लिमिट’ वाली याचिका खारिज, कोर्ट ने कहा भरण-पोषण न देना भी है आर्थिक हिंसा

सूरत  : आर्थिक शोषण लगातार अत्याचार, घरेलू हिंसा केस पर नहीं लागू होती समय सीमा- सूरत कोर्ट

सूरत।  सूरत की एक अदालत ने घरेलू हिंसा से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि आर्थिक शोषण एक निरंतर चलने वाला अत्याचार है, इसलिए ऐसे मामलों में केस दर्ज करने की कोई समय सीमा लागू नहीं होती।

कोर्ट ने पति द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें पत्नी की ओर से 5 साल बाद दायर घरेलू हिंसा की अर्जी को समयसीमा के आधार पर निरस्त करने की मांग की गई थी।

मामले के अनुसार, जहांगीरपुरा निवासी हिना पटेल ने वर्ष 2016 में पालनपुर क्षेत्र के जय पटेल से विवाह किया था। शादी के बाद वह संयुक्त परिवार में रहने लगी, जहां पति, सास और ससुर द्वारा उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किए जाने का आरोप है।

पत्नी का कहना है कि शादी के दौरान और बाद में उससे पैसों की मांग की गई, साथ ही उसके बैंक खातों और लेन-देन पर भी पति का नियंत्रण था।

आरोपों के मुताबिक, पति का किसी अन्य महिला के साथ संबंध भी था, जिसे लेकर दंपति के बीच विवाद होता रहा। इसके अलावा पति के शराब और अन्य नशे की लत के चलते आए दिन झगड़े होते थे, जिनमें पत्नी के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार भी शामिल था। वर्ष 2019 में एक घटना के दौरान कथित रूप से उसे घर से निकाल दिया गया और उसके भरण-पोषण की कोई व्यवस्था नहीं की गई।

पीड़िता ने अपने वकील के माध्यम से सूरत कोर्ट में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत पति और ससुराल पक्ष के खिलाफ अर्जी दाखिल की। इस पर पति ने कोर्ट में दलील दी कि आवेदन 5 साल बाद किया गया है, इसलिए इसे समयसीमा के आधार पर खारिज किया जाना चाहिए।

वहीं, पत्नी की ओर से अधिवक्ता प्रीति जिग्नेश जोशी ने तर्क दिया कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत आर्थिक शोषण—जैसे पत्नी का भरण-पोषण न करना—एक सतत  अपराध है। इसलिए जब तक पीड़िता को इसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं, तब तक वह न्याय के लिए आवेदन कर सकती है।

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सूरत के 9वें अतिरिक्त सिविल जज एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट एफ.के. चांद ने अपने आदेश में कहा कि, “आर्थिक शोषण और मेंटेनेंस से वंचित करना एक निरंतर चलने वाला गलत कार्य है। जब तक पीड़ित को इसके प्रभाव झेलने पड़ते हैं, तब तक यह अपराध जारी रहता है। ऐसे मामलों में समयसीमा की दलील मान्य नहीं होती।”

कोर्ट ने पाया कि पीड़िता वर्तमान में अपने मायके में रह रही है और पति द्वारा उसके भरण-पोषण की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। इसे स्पष्ट आर्थिक हिंसा मानते हुए कोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी और मामले की सुनवाई आगे जारी रखने का निर्देश दिया।

(नोट: मामले में पक्षकारों के नाम परिवर्तित किए गए हैं।)

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