सूरत : करुणा सेवक गौसेवा ट्रस्ट की पहल: ‘वैदिक होली’ बनी जन-आंदोलन
गोबर के कंडों से होलिका दहन, पर्यावरण संरक्षण के साथ गौशालाओं को आर्थिक संबल
पर्यावरण संरक्षण और गौवंश संवर्धन के उद्देश्य से शुरू की गई ‘वैदिक होली’ की परंपरा अब गुजरात में जन-आंदोलन का रूप ले चुकी है। इसकी शुरुआत वर्ष 2015 में सूरत स्थित करुणा सेवक गौसेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा की गई थी, जिसका उद्देश्य होलिका दहन में लकड़ी के स्थान पर गाय के गोबर से बने कंडों (उपले), यज्ञ सामग्री और औषधियों का उपयोग बढ़ावा देना है।
ट्रस्ट के निरंतर जागरूकता अभियानों के परिणामस्वरूप आज अकेले सूरत शहर में 1000 से अधिक स्थानों पर वैदिक होली जलाई जा रही है। यह पहल धीरे-धीरे पूरे गुजरात में फैल चुकी है, जिससे न केवल पेड़ों की कटाई में कमी आई है बल्कि गौशालाओं को गोबर से अतिरिक्त आय का स्रोत भी प्राप्त हुआ है। कई गौशालाएं इस मॉडल से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने लगी हैं।
ट्रस्ट से जुड़े सुभाष अकबरी ने बताया कि होलिका दहन के लिए ‘गोकाष्ठ’ (गोबर से बनी लकड़ी) सर्वोत्तम विकल्प है। उन्होंने कहा कि गोबर के उपलों का उपयोग भारतीय परंपरा का हिस्सा रहा है और यह पर्यावरण के अनुकूल भी है। इस पहल से जहां प्रदूषण कम होता है, वहीं गौशालाओं को आर्थिक सहयोग भी मिलता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह मुहिम पारंपरिक आस्था और आधुनिक पर्यावरणीय जरूरतों का संतुलित उदाहरण बनकर उभरी है, जो समाज को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा देती है।
