राजकोट : VGRC–2026: खील मशीन से फाइटर प्लेन पार्ट्स तक, राजकोट की औद्योगिक प्रगति की ‘वाइब्रेंट’ कहानी
1952 में एशिया के पहले इंडस्ट्रियल एस्टेट से शुरू हुआ सफर, आज एमएसएमई और हाई-टेक इंडस्ट्री का मजबूत केंद्र बना राजकोट
‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के मंत्र को ज़मीनी हकीकत में बदलने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री भूपेंद्रभाई पटेल के मार्गदर्शन में अब क्षेत्रीय स्तर पर ‘वाइब्रेंट गुजरात’ का आयोजन किया जा रहा है। मेहसाणा के बाद अब 11 जनवरी से राजकोट में आयोजित होने जा रहे दूसरे ‘वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस (VGRC–2026)’ को लेकर राजकोट और सौराष्ट्र के उद्योगपतियों में खासा उत्साह देखा जा रहा है।
राजकोट का औद्योगिक इतिहास आज़ादी से पहले का है और यह शहर शुरू से ही उद्योग व व्यापार के क्षेत्र में प्रगतिशील रहा है। एक समय खील मशीनें बनाकर निर्यात करने वाला राजकोट आज मर्सिडीज जैसी लग्ज़री कारों से लेकर फाइटर प्लेन तक के पुर्ज़े बनाने में सक्षम बन चुका है। गुजरात के ग्रेटर मुंबई राज्य से अलग अस्तित्व में आने से पहले ही राजकोट पंथक में छोटी-छोटी फैक्ट्रियां फैली हुई थीं, जहां कारीगर वर्ग विभिन्न प्रकार के तकनीकी कार्य करता था।
साल 1941–42 में हंसराजभाई वालंभिया द्वारा राजकोट में पहली ‘लंदन लेथ मशीन’ स्थापित की गई थी। इससे पहले सांगणवा चौक में पैरों से चलने वाली छोटी लेथ मशीन पर सिलाई मशीनों के पार्ट्स की मरम्मत होती थी। वर्ष 1946 में रविभाई वांकाणी ने नेशनल वायर प्रोडक्ट कंपनी की स्थापना की, जिसने कील बनाने की मशीनें बनाकर उनका विदेशों में निर्यात शुरू किया। यह कंपनी आज भी विभिन्न प्रकार की मशीनों का निर्यात कर रही है।
राजकोट के औद्योगिक विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर वर्ष 1952 रहा, जब तत्कालीन सौराष्ट्र राज्य के भक्ति नगर क्षेत्र में एशिया का पहला इंडस्ट्रियल एस्टेट स्थापित किया गया। इसके बाद 1954 में राजकोट के उद्योगपतियों ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समक्ष एक स्व-आयोजित औद्योगिक प्रदर्शनी लगाई। उमाकांत पंडित के सुझाव पर राजकोट इंजीनियरिंग एसोसिएशन का गठन हुआ, जबकि 1978 में राजकोट डिस्ट्रिक्ट इंडस्ट्री सेंटर की स्थापना की गई।
डीज़ल इंजन, चाकडो रिक्शा जैसी कई मशीनें राजकोट की पहचान बनीं। वर्तमान में राजकोट ज़िले में कुल 14 जीआईडीसी कार्यरत हैं। इसके अलावा नागलपार में 446 करोड़ रुपये के निवेश से मेडिकल डिवाइस पार्क, खिरसारा-2 में 131 करोड़ और पिपर्डी में 95 करोड़ रुपये के निवेश से नए जीआईडीसी विकसित किए जा रहे हैं। छपरा में नया इंडस्ट्रियल एस्टेट प्रस्तावित है, जबकि गोंडल के पास 200 करोड़ रुपये की लागत से टेक्नोलॉजी हब बन रहा है। गढ़का गांव में 500 करोड़ रुपये की लागत से अमूल डेयरी प्लांट और हीरासर में राजकोट इंटरनेशनल ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट भी ज़िले के औद्योगिक विकास को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं।
राजकोट ज़िले के विकास में माइक्रो, स्मॉल और मीडियम इंडस्ट्री (MSME) की भूमिका बेहद अहम रही है। वर्ष 2005–06 में जहां लघु उद्योग की 32,461 इकाइयां थीं, वहीं वर्तमान में राजकोट ज़िले में 2,38,069 सूक्ष्म उद्योग, 7,771 लघु उद्योग और 870 मध्यम उद्योग सहित कुल 2,46,710 एमएसएमई इकाइयां कार्यरत हैं। औद्योगिक संगठनों के अनुसार इन इकाइयों में 11 लाख से अधिक लोग प्रत्यक्ष रूप से रोज़गार पा रहे हैं।
आज राजकोट के विभिन्न जीआईडीसी क्षेत्रों में साधारण स्क्रू से लेकर ऑटो पार्ट्स, मशीन टूल्स, लक्ज़री कार लाइनर, लड़ाकू विमान और रक्षा उपकरणों तक का निर्माण हो रहा है। उद्योगपतियों को विश्वास है कि आगामी ‘वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस’ से राजकोट, सौराष्ट्र और कच्छ के उद्योगों को नई उड़ान मिलेगी।
उद्योग जगत से जुड़े वैष्णव ने कहा कि वर्ष 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्रभाई मोदी ने ‘वाइब्रेंट गुजरात’ की शुरुआत की थी। आज पहली बार राजकोट में क्षेत्रीय स्तर का वाइब्रेंट गुजरात आयोजन हो रहा है, जो सौराष्ट्र और कच्छ के उद्योगपतियों के लिए एक सुनहरा अवसर है। इससे स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाज़ार मिलेगा, निवेश बढ़ेगा, व्यवसाय का विस्तार होगा और नए रोज़गार के अवसर सृजित होंगे।
