सूरत : चैंबर ने ‘मेंटल हेल्थ – अपनी प्रॉब्लम सॉल्व करना’ पर विशेष चर्चा सत्र का आयोजन किया
डिप्रेशन एक क्लिनिकल बीमारी है, इससे डरने की जरूरत नहीं : डॉ. मुकुल चोकसी
अनकही भावनाएं शारीरिक दर्द के रूप में सामने आती हैं : डॉ. पलाश प्रजापति
सदर्न गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की ओर से 3 जनवरी को नानपुरा स्थित समृद्धि भवन में मेंटल हेल्थ को लेकर जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से एक विशेष डिस्कशन सेशन ‘मेंटल हेल्थ – अपनी प्रॉब्लम सॉल्व करना’ का सफल आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में चैंबर के सदस्यों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विशेषज्ञों द्वारा मार्गदर्शन दिया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत चैंबर के ऑनरेरी सेक्रेटरी बिजल जरीवाला के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने कहा कि आज की व्यस्त जीवनशैली में लोग न केवल मानसिक बल्कि शारीरिक समस्याओं पर भी ध्यान नहीं दे पाते, ऐसे में मेंटल वेल-बीइंग पर इस तरह के सत्र बेहद जरूरी हैं, जो समझ और समाधान की दिशा में मदद करते हैं।
जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. मुकुल चोकसी ने डिप्रेशन पर विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि डिप्रेशन एक क्लिनिकल कंडीशन है और इससे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने बताया कि लगातार उदासी, जीवन में रुचि की कमी, बेचैनी, नींद न आना जैसे लक्षण डिप्रेशन के संकेत हो सकते हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं और हमारे आसपास ऐसे कई लोग हो सकते हैं जो इससे जूझ रहे हों। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि डिप्रेशन के विभिन्न प्रकार होते हैं, लेकिन अच्छी बात यह है कि इसका इलाज संभव है और सही उपचार से इस पर काबू पाया जा सकता है। यह मस्तिष्क में होने वाले केमिकल बदलावों के कारण किसी को भी हो सकता है।
मनोचिकित्सक डॉ. पलाश प्रजापति ने मन और शरीर के आपसी संबंधों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मानसिक और शारीरिक समस्याएं एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। कई बार मानसिक तनाव और अनकही भावनाएं शारीरिक दर्द या अन्य शारीरिक लक्षणों के रूप में सामने आती हैं। उन्होंने नींद न आने की समस्या को दूर करने के लिए उपयोगी सुझाव भी साझा किए।
चैंबर ग्रुप के चेयरमैन राकेश गांधी ने कार्यक्रम की रूपरेखा और इसके महत्व पर जानकारी दी। चैंबर की पब्लिक हेल्थ कमेटी के को-चेयरमैन डॉ. राजन देसाई ने पूरे सत्र का संचालन किया और अंत में धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
पूरा कार्यक्रम सवाल-जवाब के सत्र के रूप में आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने डिप्रेशन, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य, सपने, चिंताएं, अनिद्रा, बच्चों में मोबाइल और गैजेट्स के बढ़ते उपयोग, क्या मानसिक बीमारी की दवाएं जीवनभर लेनी पड़ती हैं, तथा Gen Z में FOMO जैसी समस्याओं को लेकर सवाल पूछे। कार्यक्रम ने मेंटल हेल्थ को लेकर जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
