93 वर्षीय ज्योत्सना बॉस बनी कोरोना संशोधन के लिए अपना शरीर दान करने वाली प्रथम भारतीय महिला

प्रतिकात्मक तस्वीर

द्वितीय विश्व युद्द के दौरान परिवार सहित बर्मा से भारत आई थी ज्योत्सना, 1946 में शामिल हुई थी बॉस ट्रेड यूनियन में शामिल

पूरा देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा है। कई लोग कोरोना के इस कठिन काल में लोगों की निस्वार्थ भाव से सेवा कर मानवता की मिसाल पेश कर रहे है। ऐसे में पश्चिम बंगाल की इस महिला ने जो किया है, उससे वह मरने के बाद कोरोना संक्रमित लोगों के लिए सहायभूत हो पाएगी। पश्चिम बंगाल में कोलकाता की 93 वर्षीय महिला ज्योत्सना बोस कोविड-19 पर संशोधन के लिए अपना शरीर दान करने वाली पहली भारतीय महिला बन गई हैं। यह जानकारी पश्चिम बंगाल के एक गैर-लाभकारी संगठन गंदर्पन ने साझा की है, जो पैथोलॉजिकल ऑटोप्सी की सुविधा देता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूर्व ट्रेड यूनियन नेता ज्योत्सना बोस कोरोना से संक्रमित थीं। जिसके चलते उन्हें 14 मई को उत्तरी कोलकाता के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। लेकिन दो दिन बाद ज्योत्सना बोस कोरोना से जंग हार गई और उनकी मौत हो गई। उनका जन्म 1927 में बांग्लादेश के चटगांव में हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा से लौटने के बाद उनके पिता लापता हो गए, जिससे परिवार आर्थिक संकट में पड़ गया। आर्थिक संकट के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी और ब्रिटिश टेलीफोन में एक ऑपरेटर के रूप में नौकरी शुरू की। कुछ ही समय बाद, ज्योत्सना 1946 में बोस ट्रेड यूनियन आंदोलन में शामिल हो गई और नौसेना के विद्रोह को समर्थन दे रहे एक टेलीग्राफ हड़ताल में शामिल हो गए। उसके बाद से ही ज्योत्सना बॉस का ट्रेड यूनियन के नेता के तौर पर कार्यकाल शुरू हुआ।
ज्योत्सना बोस का पार्थिव शरीर कोविड-19 के शोध के लिए दान करने के बाद नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. बिस्वजीत चक्रवर्ती का पार्थिव शरीर भी दान किया गया। डॉ बिस्वजीत चक्रवर्ती भी कोरोना के सामने अपनी ज़िंदगी की जंग हार गए थे। ज्योत्सना कोरोना के संशोधन के लिए शरीर दान करने वाली पहली भारतीय महिला हो सकती हैं, लेकिन वह पश्चिम बंगाल में शरीर दान करने वाली दूसरी व्यक्ति हैं। इसके पहले गंदर्पन के संस्थापक ब्रोजो रॉय अपना शरीर दान करने वाले पहले व्यक्ति थे।

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