होली की रंगत जमने लगी; मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ में प्रणय पर्व 'भगोरिया' की आहट

वृंदावन में सुलभ फाउंडेशन द्वारा विगत वर्षों में आयोजित होली समारोह की फाइल तस्वीर (Photo : IANS)

आयोजन की तैयारियों में जुटा आदिवासी वर्ग, कहीं मांदल बनाए जा रहे हैं, तो कहीं युवा-युवतियां अपने जीवन साथी की तलाश के लिए योजनाएं बनाने में लगे हैं...

भोपाल, 11 मार्च (आईएएनएस)| होली का पर्व करीब आते ही मध्य प्रदेश के मालवा-निमाड़ क्षेत्र में प्रणय पर्व 'भगोरिया' की आहट सुनाई देने लगी है। इस आयोजन की तैयारियों में आदिवासी वर्ग जुटा है, कहीं मांदल बनाए जा रहे हैं, तो कहीं युवा-युवतियां अपने जीवन साथी की तलाश के लिए योजनाएं बनाने में लगे हैं, उन्हें इंतजार है उस दिन का जब इस पर्व की शुरुआत हो।
भगोरिया हाट होली से एक सप्ताह पहले
रंगों के पर्व होली से पहले ही मालवा-निमाड़ में भगोरिया पर्व की चर्चाएं जोर पकड़ने लगती हैं, तो दूसरी ओर तैयारियों का दौर शुरू हो जाता है। आम तौर पर भगोरिया हाट होली से लगभग एक सप्ताह पहले आयोजित किए जाते हैं। इसी माह के अंत में होली का दहन है और इससे एक सप्ताह पहले 21 मार्च से भगोरिया मेलों की शुरुआत होने वाली है।
भगोरिया मेला आदिवासी वर्ग के युवाओं और युवतियों के लिए खास
भगोरिया मेला आदिवासी वर्ग के युवाओं और युवतियों के लिए खास होता हैं, क्योंकि वे अपने जीवन साथी का चुनाव करते हैं। भील युवक-युवतियां परंपरा का निर्वाहन करते हुए अपनी पसंद के साथी को इन मेलों में खोजते हैं। इस मौके पर युवक की ओर से युवती को पान दिया जाता है और अगर युवती इसे स्वीकार कर लेती है तो मान लिया जाता है कि दोनों एक दूसरे को पसंद हैं। इसके बाद दोनों भाग जाते हैं और तब तक घर नहीं लौटते जब तक दोनों के परिवार वाले शादी की हामी नहीं भर देते।
होली की रंगत
मालवा-निमांड के बड़वानी, झाबुआ, अलिराजपुर, खरगोन, धार आदि के आदिवासी इलाकों की होली के मौके पर रंगत ही अलग होती है और यह नजर भी आने लगी है, तैयारियां जारी हैं। भगोरिया हाट में खास तौर पर मांदल की थाप माहौल को और मादक बना देती हैं। यह मांदल भी बनाई जा रही हैं।
जानें मांदल बनाने की कहानी
मांदल बनाने वाले उमराव सिंह बताते हैं कि, "यह 21 दिन में बनकर तैयार होते हैं। यह मांदल सेमला के पेड़ से बनाई जाती हैं। पहले तो उस पेड़ का चयन आसान नहीं होता, जिससे मांदल बन सके। सौ में से मुश्किल से एक ऐसा पेड़ मिलता है जिससे मांदल बन सकती हैं। पेड़ को काटने से पहले उसकी पूजा की जाती है, अर्थात पेड़ से ही उसे काटने की अनुमति ली जाती है, उसके बाद मांदल बनती हैं। एक मांदल 20 हजार तक में बनती है।"
बताते है कि मांदल के बनाने की प्रक्रिया है, इसमें पहले पेड़ के तने का हिस्सा निकालकर खोखला करने के बाद गोलाई में काटा जाता है, फिर सूखने पर उसकी घिसाई की जाती है और मोम से पालिश की जाती है। सन की रस्सी और चमड़ा चढ़ाया जाता है। उसके बाद मांदल तैयार हो जाती है।

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