चैत्र नवरात्रि विशेष : जब अपना सर काट कर देवी ने मिटाई थी अपनी सखियों की भूख, झारखंड में स्थित छिन्नमस्तिका माता का यह मंदिर है काफी अनोखा

माता का अंतिम विश्राम स्थल माना जाता है मंदिर, सप्तमी के दिन चढ़ाई जाती है बकरी की बाली

देश भर में फिलहाल चैत्री नवरात्रि मनाई जा रही है। आज तीसरे दिन चंद्रघंटा के रूप में मां दुर्गा की पूजा की जा रही है। सुबह से ही मां के मंदिरों में भक्तों की भीड़ देखी जा सकती है। लाल फूल और लाल चुनर से मां की पूजा की जाती है। इस मौके पर झारखंड के छिन्नमस्तिका देवी मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ देखी जा सकती है। राजधानी से करीब 80 किलोमीटर दूर रामगढ़ जिले के रजरप्पा में स्थित इस मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना है। माँ यहाँ बिना सिर के स्थित है और यह माँ कामाख्या मंदिर के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्ति पीठ है। 
रजरप्पा का मां छिन्नमस्तिका का मंदिर भैरवी-भेदा और दामोदर नदियों के संगम पर स्थित है। वैसे तो यहां साल भर भक्तों की आवाजाही देखने को मिलती है, लेकिन नवरात्रि के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। इस मंदिर में माताजी बिना सिर के विराजमान हैं। मंदिर में माता की मूर्ति में गले से बहने वाली रक्त की धारा  देखी जा सकती है माताजी का कटा हुआ सिर उनके हाथ में है, और उनके गले से रक्त की धारा बह रही है। चट्टान में देवी की तीन आंखें हैं। गले में सांप और कण्ठमाला पाए जाते हैं। माताजी के बाल खुले हुए हैं और जीभ बाहर निकली हुई है। इस स्वरूप में माता कामदेव और रति के ऊपर नग्नाअवस्था में खड़ी है।
यहां मां की मौजूदगी के पीछे एक पौराणिक गाथा है। कथा के अनुसार एक बार मां भवानी अपनी दो सहेलियों के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गई थीं। नहाने के बाद उसकी सहेलियों को भूख लग गई। दोनों को इतनी अधिक भूख लगी थी की वह काली हो गई। उन्हों ने माताजी से कुछ खाने को माँगा। अपनिओ सहेलियों को तड़पता देख माई ने तलवार से अपना सिर काट लिया। कथा के अनुसार माताजी का कटा हुआ सिर फिर उनके हाथ पर गिरा और रक्त की धारा बहने लगी। माताजी ने अपने सिर से रक्त की दो धाराएँ अपनी सहेलियों की ओर बहा दीं। उनके इस रूप को तब से छिन्नमस्तिका के नाम से जाना जाता है।
इस मंदिर का इतिहास छह हजार साल पुराना है। पुराणों में भी माताजी का वर्णन मिलता है। मंदिर की वास्तुकला इसकी प्राचीनता का प्रमाण है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण महाभारत के समय हुआ था। इस मंदिर के अलावा सात अन्य मंदिर हैं, जिनमें महाकाली मंदिर, सूर्य मंदिर, दास महाविद्या मंदिर, बाबाधाम मंदिर, बजरंगबली मंदिर, शंकर मंदिर और विराट रूप मंदिर शामिल हैं। मंदिर के पश्चिम से दामोदर नदी बहती है और भैरवी नदी दक्षिण से बहती है।
माना जाता है कि मां रात के समय मंदिर में विचरण करती हैं। यही कारण है कि रात के समय एकांत दिखाई देता है और कई साधक तंत्र मंत्र की प्राप्ति में लग जाते हैं। नवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में साधु यहां आते हैं और मंदिर में 13 हवन कुंडों में विशेष अनुष्ठान करके सिद्धि प्राप्त करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थान माताजी का अंतिम विश्राम स्थल भी है। यहां चैत्र नवरात्रि के सातवें दिन सुबह के समय एक बकरे का भोग लगाया जाता है। फिर कटे हुए सिर पर कपूर रखकर आरती की जाती है।

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