अहमदाबाद : भगवान करे, नाइट्रोजन मशीन में से ऑक्सिजन बनाने का ये प्रयोग कामयाब हो जाए!

प्रतिकात्मक तस्वीर (Photo:AFTAB ALAM SIDDIQUI /IANS)

मात्र 15 लाख के खर्च में 500 बेड की अस्पताल को मिल सकेगा लगातार ऑक्सीज़न

कहते है की मनुष्य की जरूरत ही संशोधन की जननी है, कुछ ऐसा ही एक बार फिर सामने आया है। कोरोना के इस कठिन काल में जहां अस्पतालों में ऑक्सीज़न की कमी के कारण मरीजों का बुरा हाल है। ऐसे में अस्पतालों में ऑक्सीज़न की इस कमी को पूर्ण करने के लिए अहमदाबाद पूर्व के सांसद एचएस पटेल और उनके सहायक ने नाइट्रोजन मशीन में से ऑक्सीज़न किस तरह निकाला जा सके इसके ऊपर प्रयास शुरू किए है। यदि यह प्रयोग सफल होता है तो घर बैठे ही सभी अस्पतालों को बिलकुल मामूली खर्च पर ऑक्सीज़न मिल सकेगा। 
बता दे की अहमदाबाद की अधिकतर अस्पतालों में फिलहाल ऑक्सीज़न की काफी कमी है। ऐसे में अहमदाबाद पूर्व के सांसद एचएस पटेल ने एक 600 बेड की अस्पताल बनाने के लिए अपनी कमर कसी। जिसमें मरीजों के भोजन और दवा का खर्च उठाने के लिए इंडस्ट्रीज असोशिएशन और स्टाफ के मेनेजमेंट के लिए अहमदाबाद नगर निगम तैयार हो गया। हालांकि इसके बाद काम अटका, लिक्विड ऑक्सीज़न के मुद्दे पर। लिक्विड ऑक्सीज़न के टेंक बनाना तात्कालिक संभव नहीं था। इसलिए उनका अस्पताल का काम रुक गया।
इसी विचार में अपने असिस्टेंट के साथ बैठे बैठे उन्हें विचार आया की गुजरात में नाइट्रोजन बनाने के काफी प्लांट है। यदि किसी तरह इन प्लांट में ऑक्सीज़न का उत्पादन शुरू हो जाए तो कुछ रास्ता निकल सकता है। इस बारे में उनके असिस्टेंट नरेश भाई नागर जो की एक केमिकल इंजीनियर है, उन्होंने कहा कि नाइट्रोजन बनाने वाली मशीन जब हवा खींचती है तो उसमें ऑक्सीज़न तो आता ही है। इंडस्ट्रीज द्वारा इस में से नाइट्रोजन ले लिया जाता है और उसके बाद ऑक्सीज़न को या तो फिर से खुले आसमान में छोड़ दिया जाता है या तो उसे बोइलर में जला दिया जाता है। ऐसे में यदि इस ऑक्सीज़न को लिक्विड बनाने का रास्ता मिल जाये तो काम हो जाये। पर यह बहुत महंगी प्रक्रिया थी। इसलिए उन्हों ने एक अन्य उपाय ढूंढा। 
नरेश भाई ने काहा कि जब मशीन खुले में से हवा लेती है तो उसके बाद वह कार्बन सिव में से पार होती है। जिसमें से 99.9 प्रतिशत ऑक्सीज़न मिलता है। बची हुई हवा में 45 से 50 प्रतिशत ऑक्सीज़न होता है। यदि इस मशीन में कार्बन सिव कि जगह पर जिओलाइट लगा दी जाये तो अस्पतालों को सीधा ऑक्सीज़न ही मिल सकता है। फिलहाल जिओलाइट कि डिजाइन पर काम चल रहा है। एक बार वह पूर्ण हो जाये तो काफी कम कीमत में अस्पतालों को अपने आंगने में ही लगातार ऑक्सीज़न मिलने लगेगा। 
नरेश भारी ने बताया कि यदि उनके प्रयोग को सफलता मिलती है तो ऐसा नाइट्रोजन का मशीन हर अस्पताल के बाहर ही रखा जा सकता है। जिसका खर्च काफी कम आएगा। मान लीजिये कि किसी 500 बेड कि अस्पताल के लिए यदि यह प्लांट लगाना होगा तो उसका पूरा खर्च मात्र 15 लाख ही होगा। 

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