सूरत : श्री शक्ति धाम सेवा समितिः श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का हवन एवं महाप्रसाद के साथ समापन
श्री राणी सती दादी मंदिर के रजत जयंती वर्ष पर आयोजित सात दिवसीय आयोजन में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
श्री शक्ति धाम सेवा समिति द्वारा श्री राणी सती दादी मंदिर के रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर सिटी लाइट स्थित महाराजा अग्रसेन पैलेस के पंचवटी हॉल में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का सोमवार को विधिवत समापन हुआ। कथा के अंतिम दिन मुक्ति स्कंध, सुदामा चरित्र, श्री शुकदेवजी की विदाई एवं भागवत विश्राम के पश्चात हवन एवं महाप्रसाद का आयोजन किया गया।
हवन में यजमान परिवार एवं समिति के सभी सदस्यों ने परिवार सहित आहुतियां अर्पित कर सूरत सहित देश-विदेश में सुख, शांति एवं समृद्धि की मंगलकामना की। आयोजन समिति ने कथा आयोजन में सहयोग देने वाले सभी श्रद्धालुओं एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
व्यासपीठ से कथावाचक राधेश्याम शास्त्री ने भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन करते हुए कहा कि भगवान कृष्ण की 16,108 रानियां थीं और प्रत्येक के लिए अलग-अलग महल एवं सेविकाएं थीं, फिर भी सभी रानियां स्वयं भगवान की सेवा करती थीं। उन्होंने कहा कि भोजन बनाते समय सदैव सकारात्मक भाव और हरि स्मरण रखना चाहिए तथा पति-पत्नी के बीच प्रेम, सहयोग और हास-परिहास का भाव होना आवश्यक है।
महाराजश्री ने कहा कि गौदान ऐसे योग्य ब्राह्मण को करना चाहिए जो गौ सेवा कर सके। इसके साथ ही गौशालाओं में चारे की व्यवस्था करना भी पुण्य कार्य है। उन्होंने कहा कि आश्रम, गौशाला और मंदिर की धनराशि का उपयोग निजी कार्यों में करने से जीवन में दुख और दरिद्रता आती है। मंदिर से प्रसाद ग्रहण करने के साथ सेवा या दक्षिणा अवश्य देनी चाहिए।
उन्होंने बलराम चरित्र एवं भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य चरित्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान के चरित्र को सामान्य मानव जीवन की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। भागवत के मंत्र “श्री कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः” के स्मरण से जीवन के कष्ट दूर होते हैं।
शिशुपाल चरित्र का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि जो भगवान, संत और ब्राह्मण की निंदा करता है उसका कल्याण नहीं होता। उनकी बुराई सुनना भी उचित नहीं है, क्योंकि इससे भी पाप लगता है। राजसूय यज्ञ प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का वर्णन किया गया।
सुदामा चरित्र पर प्रकाश डालते हुए राधेश्याम शास्त्री ने कहा कि सुदामा ने कभी किसी से कुछ नहीं मांगा। उनकी पत्नी सुशीला भी साधारण जीवन जीते हुए सदैव यही चाहती थीं कि उनके कारण पति के भजन में कोई बाधा न आए। उन्होंने कहा कि पत्नी के सहयोग के बिना व्यक्ति का पूर्ण विकास संभव नहीं है।
उन्होंने कहा कि गुरु, मित्र और बेटी के घर कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। सुदामा के द्वारका गमन का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा के प्रेम को स्वीकार किया और चावल खाकर उनकी गरीबी दूर कर दी। उन्होंने कहा कि धन से अहंकार उत्पन्न होता है, इसलिए भगवान अपने भक्त को उतना ही देते हैं जिससे वह भक्ति मार्ग पर बना रहे। दुनिया जब देती है तो प्रदर्शन करती है, लेकिन भगवान जब देते हैं तो छिपाकर देते हैं।
कथा में तीर्थ यात्रा के महत्व को बताते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति पर देव, ऋषि और पितृ ऋण होता है। हवन से देव ऋण, शास्त्र स्वाध्याय से ऋषि ऋण और वंश वृद्धि से पितृ ऋण की पूर्ति होती है। अंत में श्री शुकदेवजी की विदाई एवं ठाकुरजी की आराधना के साथ कथा का विश्राम हुआ। श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से हवन में भाग लिया और महाप्रसाद ग्रहण कर आयोजन का समापन किया।
