सूरत : भगवान भाव के भूखे होते हैं, पदार्थ के नहीं : राधेश्याम शास्त्रीजी
श्री राणी सती दादी मंदिर के रजत जयंती वर्ष पर आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के चौथे दिन गूंजे भक्ति के स्वर
श्री शक्ति धाम सेवा समिति द्वारा श्री राणी सती दादी मंदिर के रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के चौथे दिन शुक्रवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा का श्रवण किया। सिटी लाइट स्थित महाराजा अग्रसेन पैलेस के पंचवटी हॉल में 15 जून तक चल रहे इस धार्मिक आयोजन में प्रतिदिन भक्तों की भारी उपस्थिति देखने को मिल रही है।
कथा के चौथे दिन मुख्य यजमान परिवार ने व्यासपीठ का पूजन एवं आरती की। वहीं आयोजन समिति के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने भागवताचार्य राधेश्याम शास्त्री का माल्यार्पण कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
व्यासपीठ से कथा का रसपान कराते हुए भागवताचार्य राधेश्याम शास्त्री ने गजेन्द्र मोक्ष, वामन अवतार, श्रीराम जन्मोत्सव, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, नंदोत्सव, भक्त प्रहलाद, नृसिंह अवतार और समुद्र मंथन सहित विभिन्न धार्मिक प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा के दौरान वामन भगवान, श्रीराम जन्मोत्सव और श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की सजीव झांकियां प्रस्तुत की गईं। इन मनोहारी झांकियों को देखकर श्रद्धालु भक्त भाव-विभोर हो उठे और तालियों एवं जयकारों से पूरा कथा स्थल भक्तिमय वातावरण में गूंज उठा।
शास्त्रीजी ने कहा कि जन्म-जन्मांतर के पुण्यों के फलस्वरूप ही पुरुषोत्तम मास में श्रीमद्भागवत कथा श्रवण का सौभाग्य प्राप्त होता है। भगवान संसार के कण-कण में विराजमान हैं और वे भौतिक वस्तुओं से नहीं, बल्कि प्रेम, श्रद्धा और भक्ति भाव से प्रसन्न होते हैं। भगवान भाव के भूखे होते हैं, पदार्थ के नहीं। उन्होंने कहा कि अधिकांश लोग मंदिरों में जाकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं, जबकि भक्त प्रहलाद ने भगवान से कुछ न मांगने का वरदान मांगा था। सच्ची भक्ति करने वाला भक्त अपने कुल की 21 पीढ़ियों का उद्धार कर देता है। उन्होंने कहा कि संसार के भौतिक सुख और भोग क्षणिक होते हैं, जो अंततः दुख और पीड़ा का कारण बन सकते हैं।
धर्म और समाज व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए शास्त्रीजी ने कहा कि सनातन परंपरा में चार वर्ण व्यवस्था के माध्यम से समाज में अलग-अलग जिम्मेदारियां निर्धारित की गई हैं। ब्राह्मण से ज्ञान और शिक्षा, क्षत्रिय से सुरक्षा, वैश्य से पोषण और व्यापार तथा शूद्र से सेवा की भावना समाज को प्राप्त होती है। उन्होंने श्रद्धालुओं से घर में गीता और रामायण जैसे धार्मिक ग्रंथ रखने तथा नियमित पाठ एवं स्वाध्याय करने का आह्वान किया।
नारी सम्मान के महत्व पर उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में नारी को विशेष स्थान दिया गया है। जिस घर में नारी का सम्मान होता है, वहां सुख-समृद्धि का वास होता है। गृहस्थ जीवन में स्त्री और पुरुष को समान भाव से रहना चाहिए। पुरुष को स्त्री में देवी स्वरूप तथा स्त्री को पुरुष में ईश्वर का दर्शन करना चाहिए।
जीवन के चार आश्रमों ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास पर प्रकाश डालते हुए शास्त्रीजी ने कहा कि जिस घर में पहली रोटी गौ माता के लिए निकाली जाती है, वहां सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। उन्होंने पितरों का श्राद्ध करने, समय, धन और शक्ति का सदुपयोग करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि धन का उपयोग धर्म, देश सेवा, व्यापार, परिवार पालन और समाज सेवा जैसे कार्यों में होना चाहिए।
कथा के दौरान प्रस्तुत मधुर भजनों ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। "भगवान आते नहीं मीरा के जैसे तुम बुलाते नहीं", "कर्म करते रहो राम-राम रटते रहो", "भये प्रकट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी" और "हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की" जैसे भजनों पर श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूम उठे।
समाज में बढ़ती विकृतियों पर चिंता व्यक्त करते हुए राधेश्याम शास्त्री ने कहा कि आज कुछ लोग ईश निंदा करने से भी नहीं बचते। कई स्थानों पर सत्संग के नाम पर भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण और हरि का उपहास किया जाता है। उन्होंने कहा कि जहां भी हमारे आराध्य देवों की निंदा हो, वहां सनातन धर्मावलंबियों को दूरी बना लेनी चाहिए। आयोजन समिति के अनुसार शनिवार को कथा में श्रीकृष्ण बाल लीलाएं, कालिया मर्दन, श्रीगिरिराज पूजन और छप्पन भोग जैसे प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया जाएगा।
