सीबीएसई की 9वीं कक्षा के छात्रों के लिए त्रि-भाषा नीति के खिलाफ याचिका पर अगले सप्ताह सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली, 23 मई (वेब वार्ता)। उच्चतम न्यायालय केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की 9वीं कक्षा के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य करने की नई नीति को चुनौती देने वाली याचिका पर अगले सप्ताह सुनवाई करेगा। यह याचिका नई दिल्ली, गुड़गांव, नोएडा और चेन्नई के अभिभावकों तथा शिक्षकों द्वारा दायर की गई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने इस मामले का उल्लेख किया। उन्होंने दलील दी कि इस नियम को अचानक लागू करने से 10वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं के लिए छात्रों की तैयारी प्रभावित होगी और उन पर अनुचित शैक्षणिक बोझ पड़ेगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता रोहतगी ने तर्क दिया कि जो छात्र अब तक केवल दो भाषाएं पढ़ रहे थे, उन्हें अब अचानक 9वीं कक्षा के स्तर पर एक अतिरिक्त भाषा सीखनी होगी और 10वीं कक्षा में उसकी परीक्षा देनी होगी, जिससे छात्रों के बीच भ्रम और शैक्षणिक अराजकता की स्थिति पैदा होगी। दलीलों पर संज्ञान लेते हुए पीठ ने कहा कि इस मामले को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।
यह चुनौती सीबीएसई द्वारा 15 मई को जारी एक परिपत्र (सर्कुलर) से जुड़ी है, जिसके माध्यम से “अध्ययन योजना” को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 और स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (एनसीएफ-एसई) 2023 के अनुरूप लाया गया है।
संशोधित ढांचे के तहत, 1 जुलाई, 2026 से 9वीं कक्षा में प्रवेश करने वाले छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन करना अनिवार्य होगा, जिनमें से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए। विदेशी भाषा का विकल्प केवल तभी चुना जा सकता है जब शेष दो भाषाएं भारतीय हों, अथवा इसे एक अतिरिक्त चौथे विषय के रूप में लिया जा सकता है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यह नीति सीबीएसई की इससे पहले 9 अप्रैल, 2026 को जारी अधिसूचना से बिल्कुल अलग है, जिसमें 9वीं कक्षा के स्तर पर तीसरी भाषा की अनिवार्यता को शैक्षणिक सत्र 2029-30 तक के लिए टाल दिया गया था।
याचिका में दावा किया गया है कि इस नीति को अचानक लागू करने से उन छात्रों पर अतिरिक्त शैक्षणिक बोझ पड़ेगा जो पहले से ही बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, जबकि स्कूलों में बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षित शिक्षकों और पर्याप्त अध्ययन सामग्री की कमी है।
इसमें आरोप लगाया गया है कि 9वीं कक्षा के छात्रों को अतिरिक्त भाषा सीखने के लिए छठी कक्षा के स्तर की पाठ्यपुस्तकों पर निर्भर रहने का निर्देश देना शिक्षण पद्धतियों की अपर्याप्तता को दर्शाता है, न कि किसी सार्थक भाषा ज्ञान को। याचिका में गैर-हिंदी भाषी राज्यों के छात्रों पर इस नीति के असमान प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई गई है और नई शुरू की गई तीसरी भाषा के लिए एक स्पष्ट मूल्यांकन ढांचे की अनुपस्थिति की ओर इशारा किया गया है।
