नीदरलैंड ने औपचारिक रूप से सदियों पुराने अनैमंगलम ताम्रपत्र भारत को लौटाए

ये शिलालेख 985 से 1014 ईस्वी के बीच चोल सम्राट के शासनकाल से जुड़े

नीदरलैंड ने औपचारिक रूप से सदियों पुराने अनैमंगलम ताम्रपत्र भारत को लौटाए

नई दिल्ली, 18 मई (वेब वार्ता)। भारत की सांस्कृतिक विरासत को लेकर एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई है। नीदरलैंड ने औपचारिक रूप से सदियों पुरानी अनैमंगलम ताम्रपत्र भारत को सौंप दिए हैं।

चोल काल से जुड़े इन दुर्लभ तांबे के शिलालेखों की वापसी को औपनिवेशिक काल में बाहर ले जाई गई भारतीय धरोहरों की पुनर्प्राप्ति की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह ऐतिहासिक वापसी पीएम मोदी की पांच देशों की यात्रा के दौरान नीदरलैंड दौरे में हुई।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक नीदरलैंड में ‘लीडेन प्लेट्स’ के नाम से प्रसिद्ध ये ताम्रपत्र लंबे समय से लीडेन यूनिवर्सिटी में सुरक्षित रखे गए थे। माना जाता है कि ये शिलालेख 985 से 1014 ईस्वी के बीच चोल सम्राट के शासनकाल से जुड़े हैं।

इतिहासकार इन्हें तमिल सभ्यता और चोल प्रशासनिक व्यवस्था का एक अहम दस्तावेज मानते हैं। इन अभिलेखों में नागापट्टिनम स्थित बौद्ध मठ ‘चूड़ामणि विहार’ को दिए गए भूमि अनुदान, कर व्यवस्था और राजस्व संबंधी जानकारियां दर्ज हैं। यह मठ श्रीविजय साम्राज्य के शासक श्री मार विजयोतुंग वर्मन द्वारा बनवाया गया था।

विशेषज्ञों के मुताबिक ये ताम्रपत्र केवल प्रशासनिक अभिलेख नहीं, बल्कि उस दौर के समुद्री व्यापार, धार्मिक सह-अस्तित्व और दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के सांस्कृतिक संबंधों का अहम प्रमाण हैं। इनसे यह पता चलता है कि चोल शासकों ने बौद्ध संस्थानों को संरक्षण देकर धार्मिक सद्भाव की परंपरा को मजबूत किया था।

इतिहासकार मानते हैं कि यह काल भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच मजबूत सांस्कृतिक और व्यापारिक संपर्कों का स्वर्णिम दौर था। इन ताम्रपत्रों में 21 बड़ी और 3 छोटी तांबे की प्लेटें शामिल हैं, जिनका कुल वजन करीब 30 किलोग्राम है।

इन्हें एक गोलाकार तांबे की रिंग से जोड़ा गया है, जिस पर शाही चोल मुहर लगी है। हालांकि मूल अनुदान राजराज चोल प्रथम के शासनकाल में जारी हुआ था, लेकिन बाद में उनके पुत्र राजेंद्र चोल ने इन्हें स्थाई संरक्षण के लिए तांबे की प्लेटों पर खुदवाने का आदेश दिया था।

इतिहासकारों का मानना है कि ये ताम्रपत्र 18वीं शताब्दी में डच औपनिवेशिक शासन के दौरान यूरोप ले जाए गए थे। उस समय डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने कोरोमंडल तट पर अपना प्रभाव बढ़ाया था और नागापट्टिनम को प्रमुख केंद्र बनाया था।

भारत कई सालों से इन ऐतिहासिक धरोहरों की वापसी के लिए प्रयास कर रहा था। 2022 में नीदरलैंड द्वारा औपनिवेशिक काल की कलाकृतियों की वापसी संबंधी नई नीति अपनाने के बाद इस प्रक्रिया में तेजी आई और आखिरकार अब यह अमूल्य विरासत भारत को वापस मिल गई है।