सूरत : मिडिल ईस्ट टकराव पर मंथन, नए ग्लोबल मार्केट में अवसर तलाशने पर जोर
चैंबर के सेशन में विशेषज्ञों ने दी सलाह—‘चाइना प्लस वन’ रणनीति के बीच भारतीय उद्योगों के लिए उभर रहे नए मौके
सूरत। सूरत में उद्योग जगत को बदलते वैश्विक परिदृश्य के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से सदर्न गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने “मिडिल ईस्ट में टकराव और दूसरे मार्केट में उभरते मौकों” विषय पर एक महत्वपूर्ण सेशन आयोजित किया।
यह कार्यक्रम 25 अप्रैल 2026 को सरसाना स्थित समहति परिसर में आयोजित हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में उद्योगपति और व्यापार प्रतिनिधि शामिल हुए।
कार्यक्रम की शुरुआत में चैंबर के वाइस प्रेसिडेंट अशोक जीरावाला ने उपस्थित अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि मिडिल ईस्ट में जारी जियो-पॉलिटिकल तनाव का असर वैश्विक व्यापार पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। ऐसे समय में उद्योगों के लिए जरूरी है कि वे इस स्थिति को समझते हुए नए बाजारों की तलाश करें और अपनी रणनीति को अपडेट करें।
इस मौके पर अल्बर्ट चैंबर ऑफ कॉमर्स की प्रेसिडेंट डॉ. वंदना श्रीवास्तव ने अपने विस्तृत संबोधन में मिडिल ईस्ट संकट और उसके वैश्विक सप्लाई चेन पर प्रभाव का विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि मौजूदा परिस्थितियों में कनाडा, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे क्षेत्रों में भारतीय उद्योगों के लिए नए अवसर तेजी से उभर रहे हैं।
उन्होंने उद्योगपतियों को सलाह दी कि वे गुणवत्ता, नवाचार और प्रतिस्पर्धी मूल्य निर्धारण पर ध्यान केंद्रित कर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी स्थिति मजबूत करें। साथ ही, रणनीतिक साझेदारी और बिजनेस अलायंस के जरिए वैश्विक विस्तार की संभावनाओं को भी तलाशने की आवश्यकता बताई।
डॉ. श्रीवास्तव ने ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति का उल्लेख करते हुए कहा कि वैश्विक कंपनियां अब चीन के विकल्प के रूप में भारत की ओर देख रही हैं। यह भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए एक बड़ा अवसर है, जिसे सही नीति और तैयारी के साथ भुनाया जा सकता है।
कार्यक्रम के दौरान चैंबर के ग्रुप चेयरमैन संजय पंजाबी ने कीनोट स्पीकर का परिचय दिया, जबकि ग्लोबल कनेक्ट कमेटी के चेयरमैन देवकिशन मंगानी ने सत्र का संचालन किया। अंत में उन्होंने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम का समापन किया।
इस सेशन को उद्योग और सरकार के बीच बेहतर संवाद और सहयोग की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है, जो भविष्य में इंडस्ट्री-फ्रेंडली नीतियों को बढ़ावा देने में सहायक साबित हो सकता है।
