महिला आरक्षण के लिए सरकार ने उठाया बड़ा कदम, अब लोकसभा में 33 प्रतिशत होंगी महिलाएं
नई दिल्ली, 24 मार्च (वेब वार्ता)। लोकसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का समुचित तरीके से लाभ मिले इसके लिए केंद्र की मोदी सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। संसद के मौजूदा सत्र में महिला आरक्षण को लागू करने के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश करने की तैयारी कर रही है।
इस ऐतिहासिक कदम के तहत आगामी लोकसभा और उसके बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई यानी 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित की जाएंगी। सरकार की इस योजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू लोकसभा की कुल सदस्य संख्या में भारी वृद्धि करना है।
वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ाकर 816 किए जाने का प्रस्ताव है, जिसका अर्थ है कि सदन में 273 नई सीटें जोड़ी जाएंगी। इन नई सीटों में से अधिकांश महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, जिससे मौजूदा पुरुष सांसदों की स्थिति पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह पिछले पांच दशकों में पहली बार होगा जब सीटों की संख्या में इस स्तर का इजाफा किया जाएगा।
इसके साथ ही संसद में बहुमत का आंकड़ा भी बढ़कर 409 हो जाएगा। महिला आरक्षण की राह में सबसे बड़ी बाधा परिसीमन और नई जनगणना को माना जा रहा था। नारी शक्ति वंदन अधिनियम में पहले इसे नई जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ा गया था, लेकिन अब सरकार इस प्रावधान को अलग करने पर विचार कर रही है।
नई जनगणना में होने वाली देरी को देखते हुए सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर ही नया परिसीमन कराने की योजना बना रही है, ताकि 31 मार्च 2029 के बाद होने वाले चुनावों में महिला कोटा प्रभावी रूप से लागू किया जा सके। इस बदलाव से दक्षिण भारतीय राज्यों की उन चिंताओं का भी समाधान होगा, जिन्हें डर था कि जनसंख्या नियंत्रण के सफल प्रयासों के कारण संसद में उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
सरकार ने सुनिश्चित किया है कि प्रत्येक राज्य की सीटों में 50 प्रतिशत की वृद्धि होगी, जिससे उनका आनुपातिक प्रतिनिधित्व बना रहेगा। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120, बिहार की 40 से 60 और केरल की सीटें 20 से बढ़कर 30 होने का अनुमान है। इसी अनुपात में अनुसूचित जाति और जनजाति की सीटों में भी वृद्धि की जाएगी।
इस विधायी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। सरकार की मंशा 4 अप्रैल को समाप्त हो रहे बजट सत्र में ही इन विधेयकों को पारित कराने की है, जिसके लिए सत्र को बढ़ाया भी जा सकता है।
चूंकि संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, इसलिए गृह मंत्री अमित शाह विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ बैठकें कर समर्थन जुटाने का प्रयास कर रहे हैं।
हालांकि, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसी कुछ पार्टियां महिला कोटे के भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए अलग से आरक्षण की मांग कर रही हैं, जबकि तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों ने बैठकों से दूरी बनाई है।
इसके बावजूद, यदि यह विधेयक पारित होता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में महिला सशक्तिकरण की दिशा में सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।
