सूरत : मिडिल ईस्ट तनाव का असर टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर, आयातित कोयले के दाम 15 प्रतिशत तक बढ़े

डाइंग-प्रिंटिंग मिलें और प्रोसेसिंग हाउस चिंतित, धूलेटी के बाद बढ़ सकते हैं प्रोसेसिंग चार्ज

सूरत : मिडिल ईस्ट तनाव का असर टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर, आयातित कोयले के दाम 15 प्रतिशत तक बढ़े

सूरत। मिडिल ईस्ट में ईरान और इज़राइल-अमेरिका के बीच जारी संघर्ष का असर अब लोकल इंडस्ट्री पर भी दिखने लगा है। टेक्सटाइल हब सूरत की उद्योग इकाइयों पर कोयले की बढ़ती कीमतों का सीधा असर पड़ने लगा है।

इंडोनेशिया से आयातित कोयले के दामों में हाल ही में 15 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे डाइंग-प्रिंटिंग मिलों और प्रोसेसिंग हाउस के संचालक परेशान हैं।

उद्योग सूत्रों के अनुसार, सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री में प्रति मिल प्रतिदिन औसतन 40 से 60 टन कोयले की खपत होती है। ऐसे में कीमतों में वृद्धि से उत्पादन लागत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होना तय है।

जानकारी के मुताबिक, कोयले के ट्रांसपोर्टेशन चार्ज में पिछले शनिवार को 5 डॉलर प्रति टन और उसके बाद सोमवार को 3 डॉलर प्रति टन की अतिरिक्त बढ़ोतरी की गई है। भारतीय मुद्रा में यह बढ़ोतरी लगभग 720 रुपये प्रति टन बैठती है।

साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन (एसजीटीपीए) अध्यक्ष जीतूभाई वखारिया ने कहा कि खाड़ी देशों में संघर्ष की शुरुआत के साथ ही खास क्वालिटी के कोयले के दाम बढ़ने की सूचना मिलनी शुरू हो गई थी। उनका कहना है कि यदि हालात ऐसे ही बने रहे तो आने वाले दिनों में कीमतों में और वृद्धि हो सकती है।

खाड़ी देशों में चल रहे युध्द की स्थिति के बीच कोयले के डिस्ट्रीब्युटरों द्वारा मनमाने ढंग के कृत्रिम भाव वृध्दि थोपी जा रही है। सूरत में ज्यादातर कोयल इंडोनेशिया और ओस्ट्रेलिया से आता है जिस क्षेत्र में युध्द का कोई असर नही है। फिर भी वैश्विक गतिविधि के चलते डिस्ट्रीब्युटरों द्वारा कोयले की भाववृध्दि की जा रही है। 

कोयले की बढ़ती लागत के दबाव को देखते हुए डाईंग प्रिन्टिगउद्योग से जुड़े संचालकों ने संकेत दिए हैं कि धूलेटी के बाद प्रोसेसिंग चार्ज में वृद्धि की जा सकती है।

इस मुद्दे पर चर्चा के लिए साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन द्वारा अगले सप्ताह जनरल बोर्ड मीटिंग आयोजित कर सकती है। बैठक में कोयले की कीमतों, ट्रांसपोर्टेशन लागत और संभावित रेट रिवीजन पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। 

उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे माल और ईंधन की लागत में इसी तरह वृद्धि जारी रही, तो इसका असर तैयार कपड़ों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।