सूरत : ट्रेड यूनियनों की देशव्यापी हड़ताल से बैंकिंग सेवाएं ठप, 5,000 करोड़ का लेनदेन प्रभावित
4 नए लेबर कोड के विरोध में कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन; बैंक, LIC और आंगनवाड़ी कर्मियों समेत हजारों कर्मचारी सड़कों पर उतरे
सूरत। केंद्र सरकार की आर्थिक और श्रम नीतियों के विरोध में बुधवार को 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों द्वारा आयोजित देशव्यापी हड़ताल का सूरत सहित पूरे गुजरात में व्यापक असर देखने को मिला।
ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉइज़ एसोसिएशन (AIBEA) समेत विभिन्न संगठनों के समर्थन से शहर की बैंकिंग सेवाएं प्रभावित रहीं। प्रारंभिक अनुमान के अनुसार, हड़ताल के चलते सूरत में 5,000 करोड़ रुपये से अधिक के बैंकिंग लेनदेन पर असर पड़ा है।
ट्रेड यूनियनों का मुख्य विरोध केंद्र सरकार द्वारा 29 पुराने श्रम कानूनों को समाप्त कर चार नए लेबर कोड लागू करने के निर्णय के खिलाफ है। यूनियन नेताओं का आरोप है कि नए श्रम कानून कर्मचारी विरोधी हैं और इससे नौकरी की सुरक्षा कमजोर होगी।
उनका कहना है कि नए प्रावधानों के तहत महिलाओं को रात की पाली में काम करना पड़ सकता है तथा न्यूनतम वेतन संबंधी नियमों में भी श्रमिकों के शोषण की आशंका है। यूनियनों ने मांग की है कि चारों लेबर कोड वापस लेकर पूर्व के श्रमिक हितैषी कानूनों को पुनः लागू किया जाए।
सुबह से ही सूरत में बड़ी संख्या में श्रमिक, बैंक ऑफ इंडिया स्टाफ यूनियन सहित विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि कलेक्ट्रेट परिसर में एकत्रित हुए और नारेबाजी कर विरोध प्रदर्शन किया। हड़ताल में बैंक कर्मचारियों के अलावा एलआईसी, रेलवे, डाक विभाग, आयकर विभाग, राज्य परिवहन (एसटी), आंगनवाड़ी तथा आशा कार्यकर्ताओं ने भी भाग लिया। शहर की टेक्सटाइल और डायमंड इंडस्ट्री से जुड़ी कुछ यूनियनों ने भी आंदोलन को समर्थन दिया।
हड़ताल के कारण राष्ट्रीयकृत बैंकों में नकद जमा, निकासी और चेक क्लियरिंग जैसी सेवाएं ठप रहीं। हालांकि निजी बैंकों और डिजिटल माध्यमों (यूपीआई/एनईएफटी) के चालू रहने से आम नागरिकों को आंशिक राहत मिली। वहीं, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक उपक्रमों में कार्य प्रभावित रहा।
इस दौरान महिला कर्मचारियों ने भी अपनी चिंताएं व्यक्त कीं। जिगीशा सुरती ने कहा कि नए लेबर कोड में रात की शिफ्ट का प्रावधान महिलाओं के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जिससे सुरक्षा और पारिवारिक जीवन पर प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा और स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए कानूनों में संशोधन आवश्यक है।
वहीं जिगीशा देसाई ने बताया कि पहले 100 कर्मचारियों के साथ यूनियन बनाई जा सकती थी, जिसे अब बढ़ाकर 300 कर दिया गया है। इससे छोटे संस्थानों में यूनियन गठन कठिन हो गया है, जिससे कर्मचारियों की आवाज दबने की आशंका बढ़ेगी।
ट्रेड यूनियन नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार उनकी मांगों पर सकारात्मक रुख नहीं अपनाती है, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
