सूरत : श्रीमद् भागवत कथा का भव्य समापन, सुदामा चरित्र ने श्रोताओं को किया भावविभोर
सातवें एवं अंतिम दिन संदीप महाराज ने श्रीकृष्ण-सुदामा मित्रता, 16,108 विवाह और भागवत महिमा का किया विस्तृत वर्णन
सूरत के गोड़ादरा क्षेत्र स्थित वृंदावन नगर–1 में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा का शनिवार 3 जनवरी को सातवें एवं अंतिम दिन विधिवत समापन हुआ। अंतिम दिन की कथा में कथावाचक संदीप महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण के 16,108 विवाहों का वृतांत प्रस्तुत किया तथा सुदामा चरित्र का भावपूर्ण वर्णन किया, जिसे सुनकर श्रोता भावविभोर हो उठे।
कथा के दौरान महाराज ने बताया कि सुदामा बारह गुणों से संपन्न एक ब्राह्मण थे और वे भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के मित्र थे। चार चने अधिक खा लेने की कथा के माध्यम से सुदामा के जीवन में आई गरीबी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अत्यंत अभाव में रहने के बावजूद सुदामा ने कभी अपने मित्र कृष्ण से कुछ मांगने का विचार नहीं किया।

जब सुदामा की पत्नी सुशीला को यह ज्ञात हुआ कि भगवान श्रीकृष्ण उनके पति के मित्र हैं, तब उन्होंने सुदामा को द्वारिका जाने के लिए प्रेरित किया। सुदामा ने मित्र के घर खाली हाथ न जाने की बात कही, जिस पर पत्नी ने घर में उपलब्ध थोड़े से चावल की पोटली बनाकर साथ दी। द्वारिका पहुंचने पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने अश्रुओं से सुदामा के चरण धोए। सुदामा के फटे वस्त्र उनकी गरीबी की कहानी स्वयं कह रहे थे। भगवान ने पोटली में छिपे चावलों में से एक मुट्ठी खाई और दूसरी मुट्ठी लेने लगे, तब देवी रुक्मिणी ने उन्हें यह कहते हुए रोका कि एक मुट्ठी में ही उन्होंने दो लोक प्रदान कर दिए हैं।
कथा में आगे संदीप महाराज ने भगवान दत्तात्रेय के चौबीस गुरुओं तथा नवयोगेश्वर संवाद का भी वर्णन किया। समापन प्रसंग में सुखदेव जी और राजा परीक्षित के संवाद का उल्लेख करते हुए बताया गया कि शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है। जैसे नदियों में गंगा श्रेष्ठ है, पुराणों में श्रीमद् भागवत महापुराण श्रेष्ठ है; जैसे क्षेत्रों में काशी श्रेष्ठ है, वैसे ही कथाओं में भागवत श्रेष्ठ है।
महाराज ने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा के श्रवण से भक्ति के दोनों पुत्र—ज्ञान और वैराग्य—तरुण होकर नृत्य करने लगते हैं। कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से कथा का श्रवण कर पुण्य लाभ प्राप्त किया।
