सूरत : पेट की आग बुझाने काम तो करना ही पड़ता है, फिर वो मुर्दों के साथ ही क्यों न हो!

(Photo Credit : Gujarat Samachar)

सिविल अस्पताल में हेल्प डेस्क सुपरवाइजर की भूमिका निभा रही कविता पटेल ने साझा किया अपना अनुभव

कोरोना ने बीते ढेढ़ साल में सब कुछ बदल कर रख दिया हैं। जीवन जीने के तरीको से लेकर रहन सहन और यहाँ तक कि अंतिम संस्कार के तरीके को भी! कोरोना काल के पहले जब किसी की मौत होती तो सरे परिवार वाले उससे लिपटकर रोते, खुद कंधा देकर श्मशाम लेट और अंतिम संस्कार की विधि पूरी करते। लेकिन इस कोरोना काल में जहाँ लोग एक दुसरे के पास जाने से कतरा रहे हैं वहीं संक्रमण और लाशों की बढती संख्या के बिच अंतिम संस्कार भी सामूहिक रूप से हो रहा हैं। बहुत से परिवार ने अपने परिजनों का शव लेने से इंकार कर दिया तो कही संक्रमित मरीज के मरने के बाद उसको पूरी तरह से लपेट कर उसका अंतिम संस्कार किया गया।
इन सब हिला देने वाली घटनाओं के बीच कविता पटेल बीते साल भर से अपना काम किये जा रही हैं। कोरोना काल में मरने वाले मरीजों को लेने आये परिजनों का पंजीकरण, परिजनों द्वारा मरीज की पहचान कराना और फिर शव का दिशानिर्देश अनुसार अंतिम विधि कराने की जिम्मेदारी समाज के लिए आदर्श बन चुकी २९ वर्षीय कविता पटेल के जिम्मे हैं। बीते 182 दिन से लगातार अपना कर्तव्य निभा रही कविता पटेल बीए से अपना ग्रेजुएशन पूरा करके सिविल अस्पताल में डाटा ऑपरेटर के रूप में कार्यरत हुई। इस बीच कोरोना महामारी बढ़ने के साथ ही कविता को हेल्प डेस्क पर सुपरवाइजर की तरह काम करना पड़ा।
इस बारे में बात करते हुए कविता कहती हैं कि शुरू में तो उन्हें इन सबसे बहुत डर लगता था पर काम तो काम है और अब उन्हें इसकी आदत हो चुकी हैं। अब अथ घंटे कब बीत जाते हैं पता हिन् नहीं चलता। कविता बताती हैं कि उनका भाई शादी के बाद घर से अलग हो चूका है और अब घर और माँ-बाप  की सारी जिम्मेदारी उन्ही के कंधे पर हैं। ऐसे में इस काम से उनके घर का दो वक्त का खाना चल रहा हैं। आगे कविता कहती हैं कि ये उनकी पांचवी नौकरी हैं और भले ही इसमें पगार थोड़ी कम है पर उन्हें दुनियादारी का असली मतलब यहीं पता चला हैं। उनके अनुसार इस काम ने उन्हें दुनिया का असली चेहरा दिखाया हैं। अपने अनुभवों को लेकर कविता का कहना हैं कि इस बीच उन्होंने जो कुछ सिखा और देखा हैं उसे वो जिंदगीभर नहीं भूल सकती।

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