प्रकृति प्रेम और पर्यावरण सुरक्षा का संदेश देता वट सावित्री पूजन

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10 जून को वट सावित्री एवं शनि जयंती पर नहीं होगा ग्रहण का साया, सोमवती अमावस्या होने से निर्मित होंगे कई शुभ योग- डॉ.मृत्युंजय

हमारे ऋषि मुनियों ने पर्यावरण सुरक्षा व वृक्षारोपण को लेकर शास्त्रों में विविध प्रसंगों द्वारा जनमानस को प्रकृति प्रेम के प्रति जागरूक किया है। मुनियों ने अपनी दिव्य दृष्टि व ज्ञान से मानव को समस्याओं से मुक्त करने के लिए किसी एक दिन नही अपितु प्रतिदिन किसी न किसी व्रत उपवास के माध्यम से जोड़ा है और पूजा पाठ द्वारा पर्यावरण बचाने को जागरूक करते हुए प्रकृति को ही ईश्वर के रूप में पूज्य बतलाया है। प्रकृति प्रेम व पर्यावरण सुरक्षा का संदेश प्रतिपादित करने हेतु शास्त्रों में वट सावित्री पूजा का एक निश्चित दिवस निर्धारित है। उक्त विचार श्री कल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के अध्यक्ष डॉ. मृत्युंजय तिवारी ने बताया कि वट सावित्री पूजा हमारी सनातन संस्कृति का एक प्रमख अंग है जो सबको प्रकृति की पूजा करने हेतु प्रेरित करता है। 
आज वैज्ञानिक युग मे प्रकृति की सुरक्षा के साथ शास्त्रों में उल्लेखित प्रकृति से जुड़े प्रसंगों का महत्व और उद्देश्य लोगो को सम्पूर्ण विश्व में नजर आने लगा है। कोरोना जैसी महामारी का कहर प्रकृति की अवहेलना और छेड़छाड़ का ही परिणाम है। ऐसे में सावित्री पूजा का महत्व अब अत्यधिक महत्वपूर्ण संदेश लेकर लोगो को प्रकृति से जोड़ेगा। आगे जानकारी देते हुए डॉ.तिवारी ने बताया कि कि 10 जून को सूर्य ग्रहण भी है और ये कंकडाकृति में है। सूर्यग्रहण भारत में नहीं दिखेगा अतः इसका सूतक भी यहाँ मान्य नहीं होगा। धर्मशास्त्रों के अनुसार यदि ग्रहण दिखाई ना दे तो उसका सूतक आदि दोष मान्य नहीं होते है। 10 जून को अमावस्या है और वटसावित्री व्रत में वट यानी बरगद के पेड़ की पूजा करने का विधान है।
भारतीय संस्कृति मे पाँच वटवृक्षों का महत्व अधिक है जिनमे अक्षयवट, पंचवट, वंशीवट, गयावट और सिद्धवट का उल्लेख है जिनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता। संसार में उक्त पांच वटों को ही पवित्र वट की श्रेणी में रखा गया है। प्रयाग में अक्षयवट, नासिक में पंचवट, वृंदावन में वंशीवट, गया में गयावट और उज्जैन में पवित्र सिद्धवट है। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार वट के वृक्ष ने सावित्री के पति सत्यवान के मृत शरीर को अपनी जटाओं के घेरे में सुरक्षित रखा था ताकि जंगली जानवर शरीर को नुकसान नहीं पहुंचा सके। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, वट के वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का निवास होता है इसलिए भी महिलाएं इस वृक्ष की विशेषकर पूजा करती हैं।
स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को उक्त व्रत करने की बात कही गई है। इसीलिए गुजरात महाराष्ट्र आदि स्थानों पर यह व्रत पूर्णिमा को मनाते हैं।
सनातन संस्कृति में वट सावित्री व्रत का सर्वाधिक महत्व है। यह पूजन स्त्रियां सौभाग्य की प्राप्ति और पति की लंबी आयु की कामना को लेकर करती हैं। इस बार सोमवती अमावस्या होने से इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।  इस दिन सुहागन महिलाएं पूरे 16 श्रृंगार के बाद बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। प्रतिवर्ष वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को रखा जाता है। इसी दिन शनि जयंती पड़ने से विशेष संयोग भी बन रहा है । शनि  न्याय के देवता है तथा आयु के प्रदाता भी है इसीलिए इस व्रत का महत्व अधिक हो जाएगा।
डॉ. मृत्युञ्जय तिवारी
विभागाध्यक्ष, ज्योतिष
श्री कल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय निंबाहेड़ा, चित्तौड़गढ़ राजस्थान ।
दूरभाष - 8866774099

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