सप्ताह भर से अस्पताल की सीढ़ी पर इलाज के लिये मजबूर ये मरीज

(Photo Credit : divyabhaskar.co.in)

सभी अस्पताल में कम पड़ रहे है बेड, सिविल के डॉक्टरों ने की स्टाफ बढ़ाने की मांग

गुजरात में कोरोना संक्रमण के मामले तूफान की गति से बढ़ रहे है। राज्य में पिछले तीन दिनों से प्रतिदिन 3,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। ऐसे में स्वास्थ्य प्रणाली ने मामलों से निपटने के लिए युद्ध स्तर पर तैयारी शुरू कर दी है। इसी बीच सूरत से लाचारी की एक करुण तस्वीर सामने आई है। एक ही परिवार के तीन सदस्य कोरोना वायरस से पीड़ित हैं। लेकिन सभी को इलाज नहीं मिल पा रहा है।
महाराष्ट्र के नंदूबार जिले में एक बुजुर्ग दंपति और उनके 32 वर्षीय बेटे की रिपोर्ट सकारात्मक आई। परिजन बेहतर इलाज की उम्मीद में सूरत आए। उसके पिता का अभी अस्पताल में इलाज चल रहा है। जबकि मां और बेटे का अस्पताल के बाहर सीढ़ियों पर इलाज चल रहा है। एक तरफ अस्पताल में बेड कम हैं। ऐसी लाचारी देखकर लोगों को दया आ रही है लेकिन हर कोई मजबूर है क्योंकि इस संक्रमण में सूरत के सार्वजनिक और निजी दोनों ही अस्पताल मरीजों से भर रहे हैं। ऐसे माहौल के बीच, महाराष्ट्र के परिवार को सरकारी अस्पताल में जगह नहीं मिली। मजबूरन इलाज के लिए उन्हें एक निजी अस्पताल जाना पड़ा। लेकिन निजी अस्पताल उपचार सभी के लिए सस्ती नहीं है। इसलिए केवल पिता को ही अस्पताल में भर्ती किया गया। पिता का एक हफ्ते से अस्पताल में इलाज चल रहा है। जबकि मां और बेटे का अस्पताल के बाहर सीढियों पर इलाज चल रहा है। 
सूरत शहर से कोरोना वायरस के कारण कुल 240 लोगों की मौत हुई है। श्मशान में जगह की कमी के कारण लाश की अंतिम क्रिया में भी वेटिंग लिस्ट है। सूरत श्मशान ने अंतिम संस्कार के लिए एक टोकन प्रणाली शुरू की गई है। इसमें जिस व्यक्ति का नंबर आता है उसके लाश का अंतिम संस्कार किया जाता है। भयावह बात ये है कि अब तक जो प्रतीक्षा सूची 2 से 4 घंटे थी वो पिछले दो दिनों में मरने वालों की संख्या में भी वृद्धि के बाद आठ से दस घंटे जितनी हो चुकी है।
सूरत के सिविल अस्पताल में कोविड ओपीडी के साथ साथ नॉन-कोविड ओपीडी चल रही है इसलिए बुधवार को जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन ने कॉलेज में मीटिंग कर जिल्ला कलेक्टर, डीन सहित पदाधिकारियों से स्टाफ बढ़ाने की मांग की। सरकारी मेडिकल कॉलेज की डीन डॉ रितुंभरा मेहता ने कहा कि कोरोना के अलावा अन्य मरीजों का इलाज सिविल अस्पताल में फ़िलहाल के लिए रोका जा सकता है। यह बात तो सही है कि काम का बोझ बढ़ गया है। दूसरी ओर, वलसाड मेडिकल कॉलेज के चार मेडिकल प्रोफेसर, एनेस्थीसिया के दो मेडिकल प्रोफेसर और भावनगर, जामनगर के 16 रेजिडेंट डॉक्टर और 40 से अधिक नर्स डेपुटेशन पर आ चुके हैं।

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