सूरत : श्रमिकों की कमी से जूझता हीरा उद्योग, कोरोना के बाद नहीं लौटे प्रवासी श्रमिक

मजदूरों की कमी की वजह केंद्र सरकार की मनरेगा योजना भी

डायमंड सिटी के तौरपर सूरत शहर पूरे देश में मशहूर है। विश्व में हर 10 हीरे में से 9 हीरे को सूरत में तराशा जाता है। 15 लाख से ज्यादा लोग हीरा उद्योग के साथ जुड़े है। हीरा कारखानों में रफ हीरा तैयार किया जाता है और पॉलिश किया जाता है। कोरोना संक्रमण घटने के बाद डायमंड उद्योग में तेजी का माहौल है। लेकिन कारीगरों की कमी की समस्या से यह उद्योग जूझ रहा है। कोरोना के बाद वतन लौटे कारीगर अभी तक शहर वापस नहीं लौटे है। जिससे हीरा कारखानों में पर्याप्त प्रोडक्शन नहीं हो पाया रहा है। 
 डायमंड एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और जीजेईपीसी के वर्तमान अध्यक्ष दिनेश नावडिया का कहना है कि कोरोना काल के बाद दुनिया भर में हीरे की मांग बढ़ी है, लेकिन ऐसे समय में सूरत की हीरा कारखानों में श्रमिकों की 25 फीसदी कमी है। गुजरात के अलग-अलग हिस्सों के मजदूर ही नहीं बल्कि सूरत की फैक्ट्रियों में काम करने वाले दूसरे राज्यों के मजदूर भी नहीं लौटे हैं। ऐसे में हीरा उद्योग संगठन श्रमिकों को वापस लाने और नए श्रमिकों को तैयार करने के लिए कई प्रयास कर रहे हैं।
सूरत में मजदूरों की कमी की वजह केंद्र सरकार की मनरेगा योजना को भी माना जा रहा है। क्योंकि लॉकडाउन के दौरान अपने गांव गए मजदूरों को उनके राज्यों में सरकार की मनरेगा योजना के तहत रोजगार मिल रहा है। तीसरी लहर की आशंका को देखते हुए कुछ श्रमिक सूरत नहीं लौटना चाहते। श्रमिकों को वापस लाने के लिए सूरत में हीरा उद्योग से जुड़े संगठन हीरा कारखानों के मालिकों से वेतन और अन्य लाभों में वृद्धि की मांग कर रहे हैं।

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