दया, करुणा और मानवता के पक्षधर महात्मा बुद्ध!

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बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष

(लेखक- डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट / ईएमएस)
इस धरा पर समय समय पर महान आत्मा अवतरित होती रही है। जो देश और समाज को नई दिशा देकर दया, करुणा, ममता, प्रेम, भक्ति, मानवता, शांति के रास्ते पर राह भटके लोगों को चलाती रही है। ऐसी ही एक विभूति ने 563 ईसापूर्व वैशाख मास की पूर्णिमा को लुम्बनी वन में शाल के दो वृक्षों के बीच एक राजकुमार के रूप में उस समय जन्म लिया, जब उनकी मां कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी अपने पीहर देवदह जा रही थी  और रास्ते में ही उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हो गई थी। इस राजकुमार का नाम रखा गया सिद्धार्थ, जो आगे चल कर महात्मा बुद्ध के नाम से विख्यात हुए।
महात्मा बुद्ध का जीवन दर्शन और उनके विचार आज ढाई हजार से अधिक वर्षों के बेहद लंबे अंतराल बाद भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उनके प्रेरणादायक जीवन दर्शन का जनजीवन पर अमिट प्रभाव रहा है। हिन्दू धर्म में जो अमूल्य स्थान चार वेदों का है, वही स्थान बौद्ध धर्म में ‘पिटकों’ का है। महात्मा बुद्ध स्वयं अपने हाथ से कुछ नहीं लिखते थे बल्कि उनके शिष्यों ने ही उनके उपदेशों को कंठस्थ कर बाद में उन्हें लिखा और लिखकर उन उपदेशों को वे पेटियों में रखते जाते थे, इसीलिए इनका नाम ‘पिटक’ पड़ा, जो तीन प्रकार के हैं:- विनय पिटक, सुत्त पिटक तथा अभिधम्म पिटक।बुद्ध का कथन है ,कल्याण की भावना तथा प्राणीमात्र के प्रति दयाभाव का साक्षात्कार होता है।
बुद्ध के हृदय में बाल्यकाल से ही चराचर जगत में विद्यमान प्रत्येक प्राणी में प्रति करूणा कूट-कूटकर भरी थी। मनुष्य हो या कोई जीव-जंतु, किसी का भी दुख उनसे देखा नहीं जाता था। एक बार की बात है, जंगल में भ्रमण करते समय उन्हें किसी शिकारी के तीर से घायल एक हंस मिला। उन्होंने उसके शरीर से तीर निकालकर उसे थोड़ा पानी पिलाया। तभी उनका चचेरा भाई देवदत्त वहां आ पहुंचा और कहा कि यह मेरा शिकार है, इसे मुझे सौंप दो। इस पर राजकुमार सिद्धार्थ ने कहा कि इसे मैंने बचाया है जबकि तुम तो इसकी हत्या कर रहे थे, इसलिए तुम्हीं बताओ कि इस पर मारने वाले का अधिकार होना चाहिए या बचाने वाले का। निश्चित ही बचाने वाले का अधिकार है। यही न्याय उनके पिताजी ने उनके साथ किया।
नेपाल के मस्तांग में भगवान गौतम बुद्ध की प्रतिका का विहंगम दृश्य (Photo Credit : Wikimedia.org)
बुद्ध की सोच थी कि ‘‘जो व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से ईर्ष्या करता है, उससे वैर भाव रखता है, किसी पर बेवजह क्रोध करता है, निरीह प्राणियों पर अत्याचार या उनकी हत्या करता है, वही व्यक्ति नीच होता है। जब कोई किसी पर चिल्लाता है या उसे अपशब्द कहता है अथवा उसे नीच कहता है तो ऐसा करने वाला व्यक्ति ही वास्तव में नीचता पर उतारू होता है क्योंकि असभ्य व्यवहार ही नीचता का प्रतीक है। जो व्यक्ति किसी का कुछ लेकर उसे वापस नहीं लौटाता, ऋण लेकर लौटाते समय झगड़ा या बेईमानी करता है, राह चलते लोगों के साथ मारपीट कर लूटपाट करता है, जो माता-पिता या बड़ों का आदर-सम्मान नहीं करता और समर्थ होते हुए भी माता-पिता की सेवा नहीं करता बल्कि उनका अपमान करता है, वही व्यक्ति नीच होता है। जाति या धर्म निम्न या उच्च नहीं होते और न ही जन्म से कोई व्यक्ति उच्च या निम्न होता है बल्कि अपने विचारों, कर्म तथा स्वभाव से ही व्यक्ति निम्न या उच्च बनता है।
मध्य बिहार के धार्मिक तीर्थ स्थल गया से लगभग 10 किमी दूर वह पवित्र स्थान है जहां महात्मा बुद्ध को आध्यत्म का बोध हुआ और उन्होंने संसार से विरक्त होकर ईश्वरीय ज्ञान की अलख जगाई ,साथ ही दुनिया मे शांति व सदभाव की स्थापना के लिए उन्होंने साधना की। सिद्धार्थ अर्थात गौतम का संसार की मोह माया को त्यागकर महात्मा बुद्ध में परिवर्तित होना और अपना संपूर्ण जीवन धर्म के असली अर्थ को जानकर बोध की अवस्था को प्राप्त करना एक   चमत्कार ही है, जिसका संदेश सारे विश्व में गया है।
 बौद्ध धर्म को स्थापित करने वाले सिद्धार्थ अर्थात गौतम बुद्ध को बिहार की भूमि पर ही बोध की प्राप्ति हुई थी। जिस स्थान पर गौतम बुद्ध ने सर्वोच्च ज्ञान हासिल किया था, उस जगह को महाबोधि मंदिर, जो कि बोध गया में स्थित है, के नाम से जाना जाता है।इस मंदिर की सुरक्षा अत्यधिक है।श्रद्धालुओं को सीसीटीवी कैमरे की नजर में रखा जाता है।कैमरे व मोबाइल की एंट्री पूरी तरह प्रतिबंधित है।चाहे श्रद्धालु स्त्री हो या पुरूष दोनों को ही दो दो बार तलाशी के दौर से गुजरना पड़ता है।तब जाकर महात्मा बुद्ध के विग्रह को निहारने व वहां बैठकर साधना सुख का अवसर मिल पाता है।
बौद्ध धर्म के पवित्र स्थल के रूप में प्रसिद्ध महाबोधि मंदिर के दर्शन के लिए बौद्ध धर्म के अनुयायी देश-विदेश से बोध गया आते हैं। महात्मा बुद्ध को विष्णु का अवतार भी माना जाता है इसलिए इस मंदिर को लेकर हिन्दू धर्म के लोगों की भी गहरी आस्था है।
महात्मा बुद्ध का जीवन जितना अद्भुत था। इस मंदिर का इतिहास भी उतना ही रोचक है, जो मौर्य शासक सम्राट अशोक से जुड़ा है। गौतम बुद्ध को बोध की प्राप्ति कब हुई, इससे ठीक अनुमान से जुड़ा कोई भी दस्तावेज मौजूद नहीं है। यहां तक कि बुद्ध का जन्म किस सदी और किस तारीख को हुआ, इससे जुड़ा कोई पुख्ता प्रमाण मौजूद नहीं है।
महात्मा बुद्ध का संबंध 5वीं और 6वीं शताब्दी ईसापूर्व से है। माना जाता है तीसरी शताब्दी ईसापूर्व में सम्राट अशोक, जो बौद्ध धर्म ग्रहण करने वाले पहले शासक थे, ने इस महाबोधि मंदिर में अपने विशिष्ट पहचान वाले खंबे भी लगवाए जिनके शीर्ष पर हाथी बना होता था।
पहली शताब्दी ईसवी में इस मंदिर की परिधि में नक्काशीदार पत्थरों से बनी एक बाड़ लगा दी गई, जिसके कुछ अवशेष आज भी मौजूद हैं। इस मंदिर के भीतर एक बड़ी प्रतिमा के रूप में बुद्ध, पद्मासन में विराजमान हैं। कहा जाता है यह वही स्थान है जहां बुद्ध को निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। मंदिर के भीतर स्थित बुद्ध की प्रतिमा के आगे भूरे बलुए पत्थर पर बुद्ध के विशाल पदचिन्ह भी मौजूद हैं, जिन्हें धर्मचक्र प्रर्वतन का प्रतीक भी कहा जाता है। इस मूर्ति के चारों ओर विभिन्न रंगों के झंडे लगे हुए हैं जो इस मूर्ति को बेहद आकर्षक और विशिष्ट बनाते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि जब सम्राट अशोक ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था तब यहां हीरे-जवाहरात से बना एक सिंहासन भी बनवाया था, जिसे पृथ्वी का नाभि केन्द्र माना जाता था।
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महाबोधि मंदिर के परिसर में उन सात स्था्नों को प्रमुखता के साथ चिन्हित किया गया है जहां महात्मा बुद्ध ने ज्ञान की प्राप्ति होने के पश्चात आगामी सात सप्ताह व्यतीत किए थे।
ज्ञान प्राप्ति के पश्चात महात्मा बुद्ध ने दूसरा सप्ताह जिस वृक्ष के नीचे बिताया था उस बोधि वृक्ष की पांचवीं पीढ़ी का पेड़ आज भी वहां मौजूद है। यहां बुद्ध की एक प्रतिमा भी बनी हुई है, जिसे अनिमेश लोचन कहा जाता है। महाबोधि मंदिर का उत्तरी भाग ‘चंकामाना’ के नाम से पहचाना जाता है। इस स्थान पर बुद्ध ने निर्वाण के बाद तीसरा सप्ताह बिताया था। इस स्थान पर काले पत्थर से कमल का फूल बनाया हुआ है, जिसे बुद्ध का प्रतीक चिह्न माना जाता है।
महाबोधि मंदिर के भीतर उत्तर-पश्चिम दिशा में एक भग्नावेष है, जिसे रत्नधारा से नाम से जाना जाता है। इस भग्नावेष की छत नहीं है। माना जाता है कि बोध की प्राप्ति के पश्चात बुद्ध ने चौथा सप्ताह यहीं बिताया था। लोककथाओं के अनुसार यहां रहने के मध्य बुद्ध गहन ध्यान में लीन थे तब उनके शरीर में से एक किरण निकली थी। ऐसा माना जाता है कि ज्ञान प्रप्ति के बाद महाबोधि मंदिर के भीतर उत्तरी दरवाजे से कुछ दूरी पर स्थित अजपाला-निगोध्र वृक्ष के नीचे पांचवां सप्ताह बिताया था।
महाबोधि मंदिर के दाईं ओर स्थित मूचालिंडा झील के समीप बुद्ध ने छठा सप्ताह व्यतीत किया था। यह झी बहुत खूबसूरत और चारों ओर से फूलों से घिरी हुई है। इस झील के भीतर बुद्ध की मूर्ति स्थापित है जिसकी रक्षा एक सर्प कर रहा है। बुद्ध मूर्ति के साथ एक प्रचलित दंतकथा जुड़ी हुई है। जिसके अनुसार बुद्ध अपने ध्यान में लीन थे कि उन्हें खराब मौसम, आंधी-तूफान की भी परवाह नहीं रही। मूसलाधार बारिश में जब बुद्ध फंस गए तब सांपों के राजा मूचालिंडा ने अपने निवास से बाहर आकर उनकी रक्षा की।
मंदिर के प्रांगण के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में एक राजयातना वृक्ष है, जहां बुद्ध ने अपना सातवां सप्ताह बिताया था। इस स्थान पर महात्मा बुद्ध बर्मा से आए दो व्यापारियों से मिले थे। इन व्यापारियों ने बुद्ध से शरण मांगी तो जवाब में बुद्ध ने बुद्धम शरणं गच्छामि का उच्चारण किया।इस ऐतिहासिक मन्दिर के पास ही भगवान जगन्नाथ का मंदिर भी है।जो भी देश विदेश से श्रद्धालु आते है,वे महाबोधि मन्दिर के साथ साथ भगवान जगन्नाथ के भी दर्शन करना नही भूलते ।इस मंदिर की सुरक्षा भी अचूक सुरक्षा चक्र से बनाई गई है।जो आस्था को प्रभावित भी करती है।परंतु उक्त स्थान पर हो चुके आतंकी हमले के कारण यह सुरक्षा जरूरी हो गई है।पटना महानगर का इतिहास भी 600 शताब्दी पूर्व भगवान बुद्ध के समय से जुडा है। पटना तब एक छोटा सा कस्बा हुआ करता था और इसे पाटलीपुत्र नाम से दुनियाभर में पहचान मिली हुई थी। राजा अजात शत्रु ने अपने शत्रु लिच्छवी 
गणतन्त्र का मुकाबला करने के लिए गंगा किनारे इस पाटलीपुत्र कस्बे को एक किले के रूप में विकसित किया। जिसके तहत कस्बे के चारो ओर दीवारे बनाई गई। इसके बाद महात्मा बुद्ध यहां आए और कुछ समय यहां प्रवास किया ,इसी कारण पटना को भगवान बुद्ध की नगरी भी कहां जाता है। 

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