गुजरात : इजरायल की बागवानी खेती द्वारा सूखे प्रदेश में कम पानी में भी कर सकते हैं अच्छी आमदनी

सेवानिवृत्ति के बाद डॉ.अरुण आचार्य इजरायली खजूर की करते हैं खेती

डॉ.अरुण आचार्य सेवानिवृत्ति के बाद भी सक्रिय रहकर रेगिस्तानी इलाके में खेती और स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां हांसिल की

 सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद क्या करें और कैसे समय व्यतीत करें यह कई अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए एक हैरान करने वाला प्रश्न है। जबकि कई अधिकारी और कर्मचारी ऐसे हैं जो लंबे समय तक सरकार में सेवा करने के बाद सेवानिवृत्ति में भी एक नई पारी शुरू करते हैं और आनंद से जीवन व्यतीत करते हैं। आज हम एक ऐसे अधिकारी के बारे में बात करना चाहते हैं जिसने स्वास्थ्य विभाग में चिकित्सा अधिकारी के रूप में अपना करियर शुरू किया और मुख्य जिला स्वास्थ्य अधिकारी के पद तक अपनी यात्रा पूरी की। बनासकांठा जिले के वाव तालुका के खिमाणावास गांव में रहने वाले सेवानिवृत्त मुख्य जिला स्वास्थ्य अधिकारी अरुण आचार्य सेवानिवृत्ति के बाद स्वास्थ्य देखभाल के साथ बागवानी की खेती करते हैं।
 खिमाणावास गांव के एक खेत में रहने वाले डॉ.अरुण आचार्य सुबह जल्दी उठते हैं और अपने खेत में वेवेल खारेक के पौधों की देखभाल करते हैं। रिटायरमेंट के कुछ दिनों बाद उन्होंने वाव-सुइगाम हाईवे पर एक छोटा सा अस्पताल शुरू किया ताकि आस-पास के लोगों को अच्छा स्वास्थ्य इलाज मिल सके। सुबह नौ बजे अस्पताल पहुंच जाते हैं  और लोगों के इलाज में जुट जाते हैं। पिछले डेढ़ साल से वह इस क्षेत्र के लोगों का कोविड-19 की स्थिति में भी यही रूटीन बनाकर इलाज कर रहे हैं। बागवानी खेती करते डॉ. आचार्य के फार्म की मुलाकात लेने जैसी है।   खेत की सुंदरता, आंख को पकड़ने वाली सफाई, पक्षियों की चहकती और विदेशी इजरायली खारेक के पौधों से बढ़ जाती है। 
डॉ. अरुण आचार्य ने बताया कि 'जब मैं काम पर था तो मेरे पिता स्व. हरजीभाई वर्ष 2010-11 में कच्छ के मुंद्रा से इजरायली बरही प्रजाति के 260 पौधे लाए और खारेक को 5 एकड़ जमीन में लगाया। उस समय एक पौधे की कीमत 2700 रुपये पड़ा था। खेरक की बागवानी खेती के लिए  राज्य सरकार के उद्यान विभाग द्वारा प्रति पौधे 1250 रपुये की सब्सीडी मिलती है। खारेक का एक पौधा 8 x 9 मीटर की दूरी पर लगाया गया है। इन सभी पौधों को तनों में खाद डालकर पूरी तरह से जैविक तरीके से पकाया जाता है। यह इलाका रेगिस्तान से सटा हुआ है। इस क्षेत्र में पानी थोड़ा कमी है यानी बोर से 1,400 टीडीएस वाला पानी आता है लेकिन वह पानी खारेक( खजूर) की खेती के लिए अच्छा है। उन्होंने कहा कि पूर्व में इस रेगिस्तानी इलाके में सिर्फ धूल  उड़ते थे। अब नर्मदा नीर के आने से किसानों ने तीन फसलों की कटाई शुरू कर दी है और कृषि के क्षेत्र में एक नया बदलाव आया है।  डॉ. अरुण आचार्य ने कहा कि इजरायली खजूर की बुवाई के बाद चार साल बाद आय  शुरू होती है। हम बाजरा, ज्वार, जीरा, मूंगफली आदि खारेक (खजूर)  पौधों के बीच की जगह में अंतरफसल के रूप में उगाते हैं। उन्होंने कहा, "शुरुआत में रखरखाव के अभाव में अपेक्षित उत्पाद नहीं मिल पाता था लेकिन अब मैं खेत पर रहता हूं और इसकी देखभाल करता हूं।" एक पौधे से तकरीबन 200 किग्रा. खारेक (खजूर) होता है। जो बाजार में थोक मूल्य पर इसे 60 रुपये में बेचते हैं और इसे 70 से 80 रुपये के खुदरा मूल्य पर बेचा जाता है। उन्होंने कहा कि खारेक (खजूर) की खेती से अच्छी खासी आमदनी होती है। उन्होंने क्षेत्र के किसानों से खरेक की खेती करने और अच्छी आय प्राप्त करने का आग्रह किया।
स्वाद में मीठा होने के साथ-साथ यह शरीर के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है, जिससे  लोग खूब खाते हैं। खारेक में उच्च पोषक तत्व होने से शरीर में ऊर्जा बढ़ती है। खारेक विटामिन ए, के, बी 6 और कैल्शियम, आर्यन, मैग्नीशियम, मैंगनीज, पोटेशियम, सल्फर, कॉपर, प्रोटीन आदि जैसे खनिजों से भरपूर है। डॉ. अरुण आचार्य कहते हैं कि खारेक का एंटीऑक्सीडेंट होने के कारण यह हृदय को स्वस्थ और हड्डियों को मजबूत बनाता है। खरेक खाने से कब्ज दूर होती है। यह मस्तिष्क को भी स्वस्थ रखता है, जिसमें एलर्जी से बचाव, हरसमसा से राहत और  बालों के झड़ने से बचाने के अलावा दिमाग को भी तंदुरुस्त रखता है।  

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